धूप Poetry (page 9)

इक रौशनी का ज़हर था जो आँख भर गया

सोहन राही

मेरी रुस्वाई का यूँ जश्न मनाया तुम ने

सिया सचदेव

है धूप तेज़ कोई साएबान कैसे हो

सिया सचदेव

अब तिरे शहर से चुप-चाप गुज़रना होगा

सिया सचदेव

मेरे जिगर के दर्द का चारा कब आएगा

सिराज औरंगाबादी

नज़र नीची है यार-ए-ख़ुश-नज़र की

सिकंदर अली वज्द

वो सर्द धूप रेत समुंदर कहाँ गया

सिदरा सहर इमरान

तू हर्फ़-ए-आख़िरी मिरा क़िस्सा तमाम है

सिदरा सहर इमरान

सफ़र की धूप ने चेहरा उजाल रक्खा था

सिदरा सहर इमरान

जागते दिन की गली में रात आँखें मल रही है

सिदरा सहर इमरान

न कोई नक़्श न पैकर सराब चारों तरफ़

सिद्दीक़ मुजीबी

मौज-ए-ख़याल-ए-यार ग़म-ए-आसार आई है

सिद्दीक़ मुजीबी

एक बे-मंज़र उदासी चार-सू आँखों में है

सिद्दीक़ मुजीबी

बस एक बूँद थी औराक़-ए-जाँ में फैल गई

सिद्दीक़ मुजीबी

हवा-ए-इश्क़ में शामिल हवस की लू ही रही

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

हर चंद कि प्यारा था मैं सूरज की नज़र का

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

कार-ए-मुश्किल ही किया दुनिया में गर मैं ने किया

सिद्दीक़ शाहिद

तकल्लुफ़ छोड़ कर मेरे बराबर बैठ जाएगा

शुजा ख़ावर

सहरा में कड़ी धूप का डर होते हुए भी

शोज़ेब काशिर

बिना जाने किसी के हो गए हम

शोहरत बुख़ारी

दिल-ए-आबाद का बर्बाद भी होना ज़रूरी है

शोएब बिन अज़ीज़

ये बुझे बुझे सितारे ये धुआँ धुआँ सवेरा

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

उस को अपनी ज़ात ख़ुदा की ज़ात लगी है

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

कल गए थे तुम जिसे बीमार-ए-हिज्राँ छोड़ कर

ज़ौक़

जहाँ पे बसना है मुझ को अब वो जहान ईजाद हो रहा है

शहज़ाद रज़ा लम्स

कोई साया न कोई हम-साया

शहपर रसूल

हम ज़िंदगी-शनास थे सब से जुदा रहे

शहपर रसूल

धूल उड़ती है धूप बैठी है

शीन काफ़ निज़ाम

मौज-ए-हवा तो अब के अजब काम कर गई

शीन काफ़ निज़ाम

क्या ख़बर थी आतिशीं आब-ओ-हवा हो जाऊँगा

शीन काफ़ निज़ाम

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