दिल Poetry (page 355)

काटी है ग़म की रात बड़े एहतिराम से

अली अहमद जलीली

हमारी आँख ने देखे हैं ऐसे मंज़र भी

अली अहमद जलीली

एक खिड़की गली की खुली रात भर

अली अहमद जलीली

आज जलती हुई हर शम्अ बुझा दी जाए

अली अहमद जलीली

नज़्म तकमील

अलीना इतरत

मुझे तो इंतिज़ार-ए-इश्क़ में ही लुत्फ़ आता है

अलीना इतरत

सारे मौसम बदल गए शायद

अलीना इतरत

पुकारते पुकारते सदा ही और हो गई

अलीना इतरत

मौसम-ए-गुल पर ख़िज़ाँ का ज़ोर चल जाता है क्यूँ

अलीना इतरत

ख़िज़ाँ की ज़र्द सी रंगत बदल भी सकती है

अलीना इतरत

जुनूँ में दामन-ए-दिल गरचे तार तार हुआ

अलीना इतरत

वक़्त-ए-आख़िर जो बालीं पर आजाइयो

अलीम उस्मानी

मैं नक़्श-हा-ए-ख़ून-ए-वफ़ा छोड़ जाऊँगा

अलीम उस्मानी

सिसकता चीख़ता एहसास था मिरे अंदर

अलीम सबा नवेदी

अफ़्साना मोहब्बत का पूरा हो तो कैसे हो

अलीम मसरूर

इक राज़-ए-ग़म-ए-दिल जब ख़ुद रह न सका दिल तक

अलीम मसरूर

इक मुंतज़िर-ए-वादा की शम्अ जली होगी

अलीम मसरूर

वक़्त

अलीम दुर्रानी

तू अगर दिल-नवाज़ हो जाए

अलीम अख़्तर

शरीक-ए-हाल-ए-दिल-ए-बे-क़रार आज भी है

अलीम अख़्तर

मोहब्बत क्या मोहब्बत का सिला क्या

अलीम अख़्तर

मोहब्बत का रग-ओ-पै में मिरी रूह-ए-रवाँ होना

अलीम अख़्तर

किसी के वादा-ए-फ़र्दा पर ए'तिबार तो है

अलीम अख़्तर

हाथों से मेरे छीन कर दिल का मआल ले गई

अलीम अफ़सर

चले थे भर के रेत जब सफ़र की जिस्म-ओ-जाँ में हम

अलीम अफ़सर

बन कर लहू यक़ीन न आए तो देख लें

अलीम अफ़सर

ये कहना हार न मानी कभी अंधेरों से

आलमताब तिश्ना

नफ़रत भी उसी से है परस्तिश भी उसी की

आलमताब तिश्ना

मा-सिवा-ए-कार-ए-आह-ओ-अश्क क्या है इश्क़ में

आलमताब तिश्ना

वो कि हर अहद-ए-मोहब्बत से मुकरता जाए

आलमताब तिश्ना

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