दिल Poetry (page 87)

जो तेरी यादों से इस दिल का आफ़्ताब मिले

शारिब मौरान्वी

जो अपनी चश्म-ए-तर से दिल का पारा छोड़ जाता है

शारिब मौरान्वी

जो आँसुओं की ज़बाँ को मियाँ समझने लगे

शारिब मौरान्वी

जो बात दिल में थी काग़ज़ पे कब वो आई है

शरीफ़ मुनव्वर

शहर में कैसा ख़तर लगता है

शरीफ़ अहमद शरीफ़

तिश्ना-लब कोई जो सर-गश्ता सराबों में रहा

शरर फ़तेह पुरी

ज़र्फ़ तो देखिए मेरे दिल-ए-शैदाई का

शरफ़ मुजद्दिदी

उस ने माँगा जो दिल दिए ही बनी

शरफ़ मुजद्दिदी

अपनी हस्ती को अंधे कुएँ में गिराना नहीं चाहता

शनावर इस्हाक़

मन अरफ़ा नफ़्सहू

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

बैत-ए-अंकबूत

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

अँधेरी शब से एक ला-हासिल

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

मौज-ए-दरिया को पिएँ क्या ग़म-ए-ख़म्याज़ा करें

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

मसल कर फेंक दूँ आँखें तो कुछ तनवीर हो पैदा

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

लग़्ज़िश पा-ए-होश का हर्फ़-ए-जवाज़ ले के हम

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

कनार-ए-बहर है देखूँगा मौज-ए-आब में साँप

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

जो उतरा फिर न उभरा कह रहा है

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

इधर से देखें तो अपना मकान लगता है

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

देखिए बे-बदनी कौन कहेगा क़ातिल है

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

अब मुझ से ये रात तय न होगी

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

पहले साबित करें इस वहशी की तक़्सीरें दो

शम्स-उन-निसा बेगम शर्म

कोई वज्द है न धमाल है तिरे इश्क़ में

शमशीर हैदर

जहान-ए-ख़्वाब-ए-मेहरबाँ की ख़ैर हो

शमशीर हैदर

कुछ इस तरह वो निगाहें चुराए जाते हैं

शम्स ज़ुबैरी

किसी की चाह में दिल को जलाना ठीक है क्या

शम्स तबरेज़ी

जो चाहते हो कि मंज़िल तुम्हारी जादा हो

शम्स तबरेज़ी

अपना घर भी कोई आसेब का घर लगता है

शम्स तबरेज़ी

ज़मीन तंग है यारब कि आसमान है तंग

शम्स रम्ज़ी

ये अर्ज़-ओ-समा क़ुलज़ुम-ओ-सहरा मुतहर्रिक

शम्स रम्ज़ी

मुश्तइ'ल हो गया वो ग़ुंचा-दहन दानिस्ता

शम्स रम्ज़ी

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