हुआ Poetry (page 26)

चाक चाक अपना गरेबाँ न हुआ था सो हुआ

वाजिद अली शाह अख़्तर

बुतो ख़ुदा से डरो संग दिल सिवा न करो

वाजिद अली शाह अख़्तर

अल्लाह ऐ बुतो हमें दिखलाए लखनऊ

वाजिद अली शाह अख़्तर

ऐ नसीम-ए-सहरी हम तो हवा होते हैं

वाजिद अली शाह अख़्तर

मिरे अंदर कहीं पर खो गई है

वजीह सानी

गिले शिकवे के दफ़्तर आ गए तुम

वजीह सानी

इक मोहब्बत का फ़ुसूँ था सो अभी बाक़ी है

वजीह सानी

दम-ए-विसाल ये हसरत रही रही न रही

वजीह सानी

अपने अंदाज़ में औरों से जुदा लगते हो

वजीह सानी

अच्छा हुआ कि इश्क़ में बर्बाद हो गए

वजीह सानी

फ़ज़ा में दाएरे बिखरे हुए हैं

वजद चुगताई

दुनिया अपनी मंज़िल पहुँची तुम घर में बेज़ार पड़े

वजद चुगताई

देखने में ये काँच का घर है

वजद चुगताई

चाहतों की जो दिल को आदत है

वजद चुगताई

क़द्रदानी की कैफ़ियत मालूम

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

कुछ समझ कर ही हुआ हूँ मौज-ए-दरिया का हरीफ़

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

ज़ब्त की कोशिश है जान-ए-ना-तवाँ मुश्किल में है

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

'वहशत'-ए-मुब्तला ख़ुदा के लिए

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

तीर-ए-नज़र ने ज़ुल्म को एहसाँ बना दिया

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

तल्ख़ी-कश-ए-नौमीदी-ए-दीदार बहुत हैं

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

संग-ए-तिफ़्लाँ फ़िदा-ए-सर न हुआ

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

पोशीदा देखती है किसी की नज़र मुझे

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

लुत्फ़-ए-निहाँ से जब जब वो मुस्कुरा दिए हैं

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

दिल के कहने पे चलूँ अक़्ल का कहना न करूँ

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

मुद्दत हुई है मदह-ए-हसीनाँ किए हुए

वहीदुद्दीन सलीम

मुद्दत हुई है मदह-ए-हसीनाँ किए हुए

वहीदुद्दीन सलीम

शख़्सिय्यत-ए-फ़नकार मुअ'म्मा नहीं 'वाहिद'

वाहिद प्रेमी

जो दश्त-ए-तमन्ना में हर वक़्त भटकता है

वाहिद प्रेमी

तुझ में तो एक ख़ू-ए-जफ़ा और हो गई

वहीद इलाहाबादी

आइए जल्वा-ए-दीदार के दिखलाने को

वहीद इलाहाबादी

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