हुआ Poetry (page 28)

मैं इंसाँ था ख़ुदा होने से पहले

विशाल खुल्लर

लम्हा लम्हा शोर सा बरपा हुआ अच्छा लगा

विशाल खुल्लर

क्या ख़ला आसमान था पहले

विशाल खुल्लर

आग दरिया को इशारों से लगाने वाला

विशाल खुल्लर

इक दिन तिरी गली में मुझे ले गई हवा

विपुल कुमार

वक़्त की ताक़ पे दोनों की सजाई हुई रात

विपुल कुमार

हर मुलाक़ात पे सीने से लगाने वाले

विपुल कुमार

फ़र्ज़-ए-सुपुर्दगी में तक़ाज़े नहीं हुए

विपुल कुमार

इक-दूजे में भी तो रहा जा सकता है

विनीत आश्ना

एक भी क़तरा न छोड़ा कीजिए

विलास पंडित मुसाफ़िर

मेरी कोशिश तो यही है कि ये मा'सूम रहे

विकास शर्मा राज़

कौन तहलील हुआ है मुझ में

विकास शर्मा राज़

ज़िंदगी की हँसी उड़ाती हुई

विकास शर्मा राज़

ज़र्रों की बातों में आने वाला था

विकास शर्मा राज़

ज़रा लौ चराग़ की कम करो मिरा दुख है फिर से उतार पर

विकास शर्मा राज़

वो निहत्ता नहीं अकेला है

विकास शर्मा राज़

सर-ए-अफ़्लाक बिछा चाहती है

विकास शर्मा राज़

रात भर बर्फ़ गिरती रही है

विकास शर्मा राज़

मंज़िलों से भी आगे निकलता हुआ

विकास शर्मा राज़

कई सम्तों में रस्ता बट रहा है

विकास शर्मा राज़

फ़सील-ए-शब पे तारों ने लिखा क्या

विकास शर्मा राज़

दाग़ होने लगे ज़ाहिर मेरे

विकास शर्मा राज़

अज़ल से बंद दरवाज़ा खुला तो

विकास शर्मा राज़

उस गली तक सड़क रही होगी

विजय शर्मा अर्श

तिरे ग़ुरूर मिरे ज़ब्त का सवाल रहा

विजय शर्मा अर्श

मिरी वफ़ा की मुकम्मल तू दास्ताँ कर दे

विजय शर्मा अर्श

किसी सूखे हुए शजर सा हूँ

विजय शर्मा अर्श

महताब फ़ज़ा के आइने में

वसाफ़ बासित

दूसरी रात

वर्षा गोरछिया

आवाज़

वर्षा गोरछिया

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