हुआ Poetry (page 30)

इश्क़ में हर तमन्ना-ए-क़ल्ब-ए-हज़ीं सुर्ख़ आँसू बहाए तो मैं क्या करूँ

तुर्फ़ा क़ुरैशी

हर तरफ़ फैला हुआ बे-सम्त बे-मंज़िल सफ़र

तुफ़ैल चतुर्वेदी

एक साए की तलब में ज़िंदगी पहुँची यहाँ

तुफ़ैल चतुर्वेदी

कोई वादा न देंगे दान में क्या

तुफ़ैल चतुर्वेदी

ग़ज़ल का सिलसिला था याद होगा

तुफ़ैल चतुर्वेदी

मैं अपने दरमियाँ से हट चुका हूँ

त्रिपुरारि

किसी पर भी यक़ीं कर लेते हो तुम

त्रिपुरारि

जिन से मिलना न हुआ उन से बिछड़ कर रोए

त्रिपुरारि

ऐ हवा तू ही उसे ईद-मुबारक कहियो

त्रिपुरारि

ज़िंदगानी का कोई बाब समझ लो लड़की

त्रिपुरारि

तजरबा जो भी है मेरा मैं वही लिखता हूँ

त्रिपुरारि

पुरानी चोट मैं कैसे दिखाऊँ

त्रिपुरारि

कभी किसी ने जो दिल दुखाया तो दिल को समझा गई उदासी

त्रिपुरारि

भाड़े का इक मकाँ हूँ मुझ को ख़बर नहीं है

त्रिपुरारि

नूर-जहाँ का मज़ार

तिलोकचंद महरूम

ज़हे क़िस्मत अगर तुम को हमारा दिल पसंद आया

तिलोकचंद महरूम

क्या सुनाएँ किसी को हाल अपना

तिलोकचंद महरूम

हिज्राँ की शब जो दर्द के मारे उदास हैं

तिलोकचंद महरूम

हैरत-ज़दा मैं उन के मुक़ाबिल में रह गया

तिलोकचंद महरूम

दस्त-ए-ख़िरद से पर्दा-कुशाई न हो सकी

तिलोकचंद महरूम

मुस्कुराते हुए फूलों का अरक़ सब का है

तिलक राज पारस

वो अव्वलीं दर्द की गवाही सजी हुई बज़्म-ए-ख़्वाब जैसे

तौसीफ़ तबस्सुम

था पस-ए-मिज़्गान-तर इक हश्र बरपा और भी

तौसीफ़ तबस्सुम

मरते मरते रौशनी का ख़्वाब तो पूरा हुआ

तौसीफ़ तबस्सुम

कितने ही तीर ख़म-ए-दस्त-ओ-कमाँ में होंगे

तौसीफ़ तबस्सुम

गर्द-आलूद दरीदा चेहरा यूँ है माह ओ साल के ब'अद

तौसीफ़ तबस्सुम

इक तीर नहीं क्या तिरी मिज़्गाँ की सफ़ों में

तौसीफ़ तबस्सुम

दिल था पहलू में तो कहते थे तमन्ना क्या है

तौसीफ़ तबस्सुम

आख़िर ख़ुद अपने ही लहू में डूब के सर्फ़-ए-विग़ा होगे

तौसीफ़ तबस्सुम

ज़र का बंदा हो कि महरूमी का मारा हुआ शख़्स

तौक़ीर तक़ी

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