हुआ Poetry (page 24)

फ़नकार के काम आई न कुछ दीदा-वरी भी

वामिक़ जौनपुरी

दिल तोड़ कर वो दिल में पशीमाँ हुआ तो क्या

वामिक़ जौनपुरी

दिल अज़ल से मरकज़-ए-आलाम है

वामिक़ जौनपुरी

क्या कहूँ कि क्या हूँ मैं

वलीउल्लाह वली

ख़याल दिल को है उस गुल से आश्नाई का

वलीउल्लाह सरहिंदी इशतियाक़

काबा जाने की हवस शैख़ हमें भी है वले

वलीउल्लाह मुहिब

जब नशे में हम ने कुछ मीठे की ख़्वाहिश उस से की

वलीउल्लाह मुहिब

इन दो के सिवा कोई फ़लक से न हुआ पार

वलीउल्लाह मुहिब

हर घड़ी वहम में गुज़रे हैं नए अख़बारात

वलीउल्लाह मुहिब

उस बुत ने गुलाबी जो उठा मुँह से लगाई

वलीउल्लाह मुहिब

तुम जानते हो किस लिए वो मुझ से गया लड़

वलीउल्लाह मुहिब

मिल उस परी से क्या क्या हुआ दिल

वलीउल्लाह मुहिब

मय-ए-गुल-गूँ के जो शीशे में परी रहती है

वलीउल्लाह मुहिब

किया बाग़-ए-जहाँ में नाम उन का सर्व कह कह कर

वलीउल्लाह मुहिब

ग़म-ए-जाँ तू है अगर राहत-ए-जाँ है तू है

वलीउल्लाह मुहिब

बुलबुल बजाए अपने तुझे हम-नवा से बहस

वलीउल्लाह मुहिब

सख़्त पिस्ताँ तिरे चुभे दिल में

वली उज़लत

पीर हो शैख़ हुआ है देखो तिफ़्लों का मुरीद

वली उज़लत

जा कर फ़ना के उस तरफ़ आसूदा मैं हुआ

वली उज़लत

हिन्दू ओ मुस्लिमीन हैं हिर्स-ओ-हवा-परसत

वली उज़लत

तुझ से बोसा मैं न माँगा कभू डरते डरते

वली उज़लत

तुझ क़बा पर गुलाब का बूटा

वली उज़लत

तिरे लब-बिन है दिल में शोला-ज़न मुल जिस को कहते हैं

वली उज़लत

नयन में ख़ूँ भर आया दिल में ख़ार-ए-ग़म छुपा शायद

वली उज़लत

नंग नहीं मुझ को तड़पने से सँभल जाने का

वली उज़लत

न शोख़ियों से करे हैं वो चश्म-ए-गुल-गूँ रक़्स

वली उज़लत

मिरे नज़'अ को मत उस से कहो हुआ सो हुआ

वली उज़लत

मौसम-ए-गुल में हैं दीवानों के बाज़ार कई

वली उज़लत

माह-ए-कामिल हो मुक़ाबिल यार के रू से चे-ख़ुश

वली उज़लत

मग़्ज़-ए-बहार इस बरस उस बिन बचा न था

वली उज़लत

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