हुआ Poetry (page 25)

जिन दिनों हम उस शब-ए-हज़ के सियह-कारों में थे

वली उज़लत

जब तन न रहा मेरा हूँ वासिल-ए-जानाना

वली उज़लत

ग़ुंचा-ए-दिल मिरा खा कर गुल-ए-ख़ंदाँ मेरा

वली उज़लत

दर्द जूँ शम्अ' मिले है शब-ए-हिज्राँ मुझ को

वली उज़लत

रश्क सूँ तुझ लबाँ की सुर्ख़ी पर

वली मोहम्मद वली

दिल-ए-उश्शाक़ क्यूँ न हो रौशन

वली मोहम्मद वली

याद करना हर घड़ी उस यार का

वली मोहम्मद वली

तख़्त जिस बे-ख़ानमाँ का दस्त-ए-वीरानी हुआ

वली मोहम्मद वली

जिस दिलरुबा सूँ दिल कूँ मिरे इत्तिहाद है

वली मोहम्मद वली

जब तुझ अरक़ के वस्फ़ में जारी क़लम हुआ

वली मोहम्मद वली

जब सनम कूँ ख़याल-ए-बाग़ हुआ

वली मोहम्मद वली

इश्क़ बेताब-ए-जाँ-गुदाज़ी है

वली मोहम्मद वली

दिल हुआ है मिरा ख़राब-ए-सुख़न

वली मोहम्मद वली

भड़के है दिल की आतिश तुझ नेह की हवा सूँ

वली मोहम्मद वली

मौज-ए-हवा आब-ए-रवाँ और ये ज़मीन ओ आसमाँ

वाली आसी

आज तक जो भी हुआ उस को भुला देना है

वाली आसी

वो सूरतें जो बड़ी शोख़ हैं सजीली हैं

वाली आसी

सुनो ये ग़म की सियह रात जाने वाली है

वाली आसी

फूल से मासूम बच्चों की ज़बाँ हो जाएँगे

वाली आसी

फूल से मासूम बच्चों की ज़बाँ हो जाएँगे

वाली आसी

मिल भी जाते हैं तो कतरा के निकल जाते हैं

वाली आसी

हम जो दिन-रात ये इत्र-ए-दिल-ओ-जाँ खींचते हैं

वाली आसी

आज तक जो भी हुआ उस को भुला देना है

वाली आसी

अपनी ना-कर्दा-गुनाही की सज़ा हो जैसे

वकील अख़्तर

नादान होशियार बने जिन के रूप से

वाजिद सहरी

लहूलुहान समुंदर भी देखना है अभी

वाजिद क़ुरैशी

धुएँ की ओट से बाहर भी आ गया होता

वाजिद क़ुरैशी

पड़ा है पाँव में अब सिलसिला मोहब्बत का

वाजिद अली शाह अख़्तर

लबालब कर दे ऐ साक़ी है ख़ाली मेरा पैमाना

वाजिद अली शाह अख़्तर

हाल-ए-दिल ऐ बुतो ख़ुदा जाने

वाजिद अली शाह अख़्तर

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