ख़ामुशी Poetry (page 4)

नज़र को तीर कर के रौशनी को देखने का

साजिद हमीद

वफ़ा अंजाम होती जा रही है

सैफ़ुद्दीन सैफ़

तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम

साहिर लुधियानवी

हवा ने सीने में ख़ंजर छुपा के रक्खा है

साहिबा शहरयार

छोड़ कर काशानों को ताइर गए

साहिबा शहरयार

जिसे लिख लिख के ख़ुद भी रो पड़ा हूँ

सहबा अख़्तर

जिसे लिख लिख के ख़ुद भी रो पड़ा हूँ

सहबा अख़्तर

तुम्हारे ग़म को ग़म-ए-जाँ बना लिया मैं ने

सहर महमूद

नग़्मे हवा ने छेड़े फ़ितरत की बाँसुरी में

साग़र निज़ामी

क्यूँ दिल तिरे ख़याल का हामिल नहीं रहा

साग़र ख़य्यामी

अजब मौजूदगी है जो कमी पर मुश्तमिल है

सईद शरीक़

ऐ काश ख़ुद सुकूत भी मुझ से हो हम-कलाम

साबिर ज़फ़र

जीने का दरस सब से जुदा चाहिए मुझे

साबिर ज़फ़र

ये सैल-ए-अश्क मुझे गुफ़्तुगू की ताब तो दे

सबिहा सबा, न्यूयार्क

तुम ने रस्म-ए-जफ़ा उठा दी है

सबा अकबराबादी

तू मिरी बात का जवाब न दे

रिफ़अत सुलतान

सफ़र-ए-ज़िंदगी नहीं आसाँ

रिफ़अत सुलतान

हुए जब से मोहब्बत-आश्ना हम

रिफ़अत सुलतान

फिर जो देखा दूर तक इक ख़ामुशी पाई गई

राज़ी अख्तर शौक़

ख़ुश्क दामन पे बरसने नहीं देती मुझ को

रज़ा मौरान्वी

तुझे ऐ ज़ाहिद-बदनाम समझाना भी आता है

रज़ा जौनपुरी

कहीं फ़साना-ए-ग़म है कहीं ख़ुशी की पुकार

रविश सिद्दीक़ी

गाता रहा है दूर कोई हीर रात भर

रशीद क़ैसरानी

ये ज़िंदगी तो मुसलसल सवाल करती है

रख़शां हाशमी

'नून-मीम-राशिद' के इंतिक़ाल पर

राजेन्द्र मनचंदा बानी

मौसमों की बातों तक गुफ़्तुगू रही अपनी

इक़बाल उमर

ख़ुदा से कलाम

इंजिला हमेश

ये मौसम सुरमई है और मैं हूँ

इन्दिरा वर्मा

आसूदा-ए-मता-ए-करम बोलते नहीं

इनाम हनफ़ी

शत्तुल-अरब

इलियास बाबर आवान

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