नाम Poetry (page 9)

शब-ए-फ़िराक़ न काटे कटे है क्या कीजे

वलीउल्लाह मुहिब

किया बाग़-ए-जहाँ में नाम उन का सर्व कह कह कर

वलीउल्लाह मुहिब

ग़म-ए-जाँ तू है अगर राहत-ए-जाँ है तू है

वलीउल्लाह मुहिब

जपे है विर्द सा तुझ से सनम के नाम को शैख़

वली उज़लत

इस ज़माने में बुज़ुर्गी सिफ़्लगी का नाम है

वली उज़लत

ख़ुदा ही पहुँचे फ़रियादों को हम से बे-नसीबों के

वली उज़लत

जाती रहीं किधर वो मोहब्बत की बानियाँ

वली उज़लत

जपे है विर्द सा तुझ से सनम के नाम को शैख़

वली उज़लत

गुल रहे नहिं नाम को सरकश हैं ख़ाराँ अल-अयाज़

वली उज़लत

दिलों में रहिए जहाँ के वले ख़ुदा के ढब

वली उज़लत

जिस दिलरुबा सूँ दिल कूँ मिरे इत्तिहाद है

वली मोहम्मद वली

मैं नाम-लेवा हूँ तेरा तू मो'तबर कर दे

वकील अख़्तर

सहे ग़म पए रफ़्तगाँ कैसे कैसे

वाजिद अली शाह अख़्तर

मोहब्बत से बंदा बना लीजिएगा

वाजिद अली शाह अख़्तर

लबालब कर दे ऐ साक़ी है ख़ाली मेरा पैमाना

वाजिद अली शाह अख़्तर

जा बैठते हो ग़ैरों में ग़ैरत नहीं आती

वाजिद अली शाह अख़्तर

अच्छा हुआ कि इश्क़ में बर्बाद हो गए

वजीह सानी

लगाएँ आग ही दिल में कि कुछ उजाला हो

वजद चुगताई

शौक़ देता है मुझे पैग़ाम-ए-इश्क़

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

नालों से अगर मैं ने कभी काम लिया है

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

किसी सूरत से उस महफ़िल में जा कर

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

किस नाम-ए-मुबारक ने मज़ा मुँह को दिया है

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

किसी को बे-सबब शोहरत नहीं मिलती है ऐ 'वाहिद'

वाहिद प्रेमी

दिलों में ज़ख़्म होंटों पर तबस्सुम

वाहिद प्रेमी

अपना नफ़स नफ़स है कि शो'ला कहें जिसे

वाहिद प्रेमी

रौशन हों दिल के दाग़ तो लब पर फ़ुग़ाँ कहाँ

वहीदा नसीम

हर एक गाम पे सज्दा यहाँ रवा होगा

वहीदा नसीम

लेते हैं तिरा नाम ही यूँ जागते सोते

वहीद अख़्तर

परोमीथियस

वहीद अख़्तर

आगही की दुआ

वहीद अख़्तर

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