उम्र Poetry (page 14)

शब ओ रोज़ जैसे ठहर गए कोई नाज़ है न नियाज़ है

शाज़ तमकनत

संग-आबाद की एक दुकाँ

शाज़ तमकनत

रतजगा

शाज़ तमकनत

अजनबी

शाज़ तमकनत

आब ओ गिल

शाज़ तमकनत

वो नियाज़-ओ-नाज़ के मरहले निगह-ओ-सुख़न से चले गए

शाज़ तमकनत

सुख़न राज़-ए-नशात-ओ-ग़म का पर्दा हो ही जाता है

शाज़ तमकनत

शब ओ रोज़ जैसे ठहर गए कोई नाज़ है न नियाज़ है

शाज़ तमकनत

साँसों में बसे हो तुम आँखों में छुपा लूँगा

शाज़ तमकनत

मिसाल-ए-शोला-ओ-शबनम रहा है आँखों में

शाज़ तमकनत

ख़ुद अपना हाल दिल-ए-मुब्तला से कुछ न कहा

शाज़ तमकनत

आबला-पाई से वीराना महक जाता है

शाज़ तमकनत

सब्र-ओ-क़रार टूट गया इज़्तिराब से

शायान क़ुरैशी

तर्क-ए-लज़्ज़ात पे माइल जो ब-ज़ाहिर है मिज़ाज

शौक़ बहराइची

शुऊ'र-ए-कैफ़-ओ-ख़ुशी है ज़रा ठहर जाओ

शौकत परदेसी

मुझ को जहाँ में कोई दिल-आरा नहीं मिला

शौकत परदेसी

मिरे लिए मिरी पर्वाज़ के लिए कम है

शौकत मेहदी

ये सच है दुनिया बहुत हसीं है

शारिक़ कैफ़ी

तरह तरह से मिरा दिल बढ़ाया जाता है

शारिक़ कैफ़ी

सूना आँगन नींद में ऐसे चौंक उठा है

शारिक़ कैफ़ी

मुमकिन ही न थी ख़ुद से शनासाई यहाँ तक

शारिक़ कैफ़ी

जो अपने सर पे सर-ए-शाख़-ए-आशियाँ गुज़री

शरीफ़ कुंजाही

अब किसी शाख़ पे हिलता नहीं पत्ता कोई

शरीफ़ कुंजाही

वो डर के आगे निकल जाएगा अगर यूँही

शारिब मौरान्वी

जो बात दिल में थी काग़ज़ पे कब वो आई है

शरीफ़ मुनव्वर

लग़्ज़िश पा-ए-होश का हर्फ़-ए-जवाज़ ले के हम

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

इधर से देखें तो अपना मकान लगता है

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

मैं सोचता हूँ कभी ऐसा हो न जाए कहीं

शम्स तबरेज़ी

मिरे ए'तिमाद को ग़म मिला मिरी जब किसी पे नज़र गई

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

सितारा टूट के बिखरा और इक जहान खुला

शमीम रविश

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