उम्र Poetry (page 25)

हिसाब-ए-शब

सहर अंसारी

हम अहल-ए-ज़र्फ़ कि ग़म-ख़ाना-ए-हुनर में रहे

सहर अंसारी

है एक उम्र से ख़्वाहिश कि दूर जा के कहीं

सग़ीर मलाल

मैं ढूँड लूँ अगर उस का कोई निशाँ देखूँ

सग़ीर मलाल

वक़्त की उम्र क्या बड़ी होगी

साग़र सिद्दीक़ी

इक अजनबी ख़याल में ख़ुद से जुदा रहा

साग़र मेहदी

कल हम आईने में रुख़ की झुर्रियाँ देखा किए

सफ़ी लखनवी

ग़ज़ल उस ने छेड़ी मुझे साज़ देना

सफ़ी लखनवी

पैग़ाम ज़िंदगी ने दिया मौत का मुझे

सफ़ी लखनवी

दिए कितने अँधेरी उम्र के रस्तों में आते हैं

सफ़दर सिद्दीक़ रज़ी

दीदा-ओ-दिल मिरी सरकार उठा लाए हैं

सफ़दर सलीम सियाल

सहरा में ज़र्रा क़तरा समुंदर में जा मिला

सईदुल ज़फर चुग़ताई

मासूमियत

सईदुद्दीन

पहले वो क़ैद-ए-मर्ग से मुझ को रिहा करे

सईद अख़्तर

सुकूत-ए-मर्ग में क्यूँ राह-ए-नग़्मा-गर देखूँ

सादिक़ नसीम

जब भी तिरी क़ुर्बत के कुछ इम्काँ नज़र आए

सादिक़ नसीम

ये इंतिहा-ए-जुनूँ है कि ग़ैर ही सा लगा

सादिक़ इंदौरी

वक़्त हर ज़ख़्म का मरहम तो नहीं बन सकता

सदा अम्बालवी

दे गया ख़ूब सज़ा मुझ को कोई कर के मुआफ़

सदा अम्बालवी

बड़ा घाटे का सौदा है 'सदा' ये साँस लेना भी

सदा अम्बालवी

यूँ तो इक उम्र साथ साथ हुई

सदा अम्बालवी

तबीअत रफ़्ता रफ़्ता ख़ूगर-ए-ग़म होती जाती है

सदा अम्बालवी

मंज़र-ए-रुख़्सत-ए-दिलदार भुलाया न गया

सदा अम्बालवी

अब कहाँ दोस्त मिलें साथ निभाने वाले

सदा अम्बालवी

कैसे सच से रहे बे-ख़बर आइना

सचिन शालिनी

जब भी पढ़ा है शाम का चेहरा वरक़ वरक़

साबिर ज़ाहिद

ये सोच के राख हो गया हूँ

साबिर ज़फ़र

मैं जिस के साथ 'ज़फ़र' उम्र भर उठा बैठा

साबिर ज़फ़र

महसूस लम्स जिस का सर-ए-रह-गुज़र किया

साबिर ज़फ़र

ये उम्र भर का सफ़र है इसी सहारे पर

साबिर वसीम

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