उम्र Poetry (page 44)

तेरी आँखें न रहीं आईना-ख़ाना मिरे दोस्त

फ़ैसल अजमी

नहीं हो तुम तो ऐसा लग रहा है

फ़हमी बदायूनी

तमाम उम्र हवा की तरह गुज़ारी है

फ़हीम शनास काज़मी

ऐ मुबारज़-तलब

फ़हीम शनास काज़मी

अब तो कुछ भी याद नहीं

फ़हीम शनास काज़मी

तुम्हारे ब'अद जो बिखरे तो कू-ब-कू हुए हम

फ़हीम शनास काज़मी

दिल ओ निगाह में उस को अगर नहीं रहना

फ़हीम शनास काज़मी

एक पल जा न कहूँ नैन सूँ ऐ नूर-ए-बसर

फ़ाएज़ देहलवी

ऐ जान शब-ए-हिज्राँ तिरी सख़्त बड़ी है

फ़ाएज़ देहलवी

इन उजड़ी बस्तियों का कोई तो निशाँ रहे

एज़ाज़ अहमद आज़र

लहू ने क्या तिरे ख़ंजर को दिलकशी दी है

एज़ाज़ अफ़ज़ल

ख़ुशी की मिली ये सज़ा रफ़्ता रफ़्ता

एलिज़ाबेथ कुरियन मोना

डूबने वाले को तिनके का सहारा है बहुत

एलिज़ाबेथ कुरियन मोना

वो एक पल की रिफ़ाक़त भी क्या रिफ़ाक़त थी

एजाज़ रहमानी

अब कर्ब के तूफ़ाँ से गुज़रना ही पड़ेगा

एजाज़ रहमानी

नए सफ़र में जो पिछले सफ़र के साथी थे

एजाज़ उबैद

मैं उम्र को तो मुझे उम्र खींचती है उलट

एजाज़ गुल

कोई सबब तो है ऐसा कि एक उम्र से हैं

एजाज़ गुल

थम गई वक़्त की रफ़्तार तिरे कूचे में

एजाज़ गुल

पेचाक-ए-उम्र अपने सँवार आइने के साथ

एजाज़ गुल

नहीं शौक़-ए-ख़रीदारी में दौड़े जा रहा है

एजाज़ गुल

मंज़र-ए-वक़्त की यकसानी में बैठा हुआ हूँ

एजाज़ गुल

कभी क़तार से बाहर कभी क़तार के बीच

एजाज़ गुल

इतना तिलिस्म याद के चक़माक़ में रहा

एजाज़ गुल

गली से अपनी उठाता है वो बहाने से

एजाज़ गुल

दुश्वार है अब रास्ता आसान से आगे

एजाज़ गुल

हर एक शय की हक़ीक़त से बा-ख़बर देखूँ

एजाज़ अासिफ़

मेरी मौत के मसीहा!

एजाज़ अहमद एजाज़

शुऊर-ए-नौ-उम्र हूँ न मुझ को मता-ए-रंज-ओ-मलाल देना

एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी

शुऊर-ए-नौ-उम्र हूँ न मुझ को मता-ए-रंज-ओ-मलाल देना

एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी

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