क़ैस Poetry (page 3)

शो'ला सा कोई बर्क़-ए-नज़र से नहीं उठता

सज्जाद बाक़र रिज़वी

नक़्श-ए-क़दम हैं राह में फ़रहाद-ओ-क़ैस के

साहिर देहल्वी

दश्त में क़ैस नहीं कोह पे फ़रहाद नहीं

साग़र निज़ामी

उल्टी गंगा

साग़र ख़य्यामी

इक्कीसवीं सदी का आदमी

साग़र ख़य्यामी

दिल्ली की लड़कियाँ

साग़र ख़य्यामी

बसा-औक़ात आ जाते हैं दामन से गरेबाँ में

साइल देहलवी

हवा-ए-जिंदगी भी कूचा-ए-क़ातिल से आती है

रोहित सोनी ‘ताबिश’

ये क़ैस-ओ-कोहकन के से फ़साने बन गए कितने

रियाज़ ख़ैराबादी

नज्द में क्या क़ैस का है उर्स आज

रियाज़ ख़ैराबादी

मिरे घर मिस्ल तबर्रुक के ये सामाँ निकला

रियाज़ ख़ैराबादी

घर में पहुँचा था कि आई नज्द से आवाज़-ए-क़ैस

रियाज़ ख़ैराबादी

उतरी है आसमाँ से जो कल उठा तो ला

रियाज़ ख़ैराबादी

उस हुस्न का शैदा हूँ उस हुस्न का दीवाना

रियाज़ ख़ैराबादी

उफ़ रे उभार उफ़ रे ज़माना उठान का

रियाज़ ख़ैराबादी

तेज़ है पीने में हो जाएगी आसानी मुझे

रियाज़ ख़ैराबादी

जो हम आए तो बोतल क्यूँ अलग पीर-ए-मुग़ाँ रख दी

रियाज़ ख़ैराबादी

जवानी मय-ए-अरग़वानी से अच्छी

रियाज़ ख़ैराबादी

हम भी पिएँ तुम्हें भी पिलाएँ तमाम रात

रियाज़ ख़ैराबादी

हंस के पैमाना दिया ज़ालिम ने तरसाने के बा'द

रियाज़ ख़ैराबादी

गुल मुरक़्क़ा' हैं तिरे चाक गरेबानों के

रियाज़ ख़ैराबादी

छेड़ते हैं गुदगुदाते हैं फिर अरमाँ आज-कल

रियाज़ ख़ैराबादी

आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया

रियाज़ ख़ैराबादी

आईना देखते ही वो दीवाना हो गया

रियाज़ ख़ैराबादी

नहीं क़ौल से फ़ेल तेरे मुताबिक़

रिन्द लखनवी

इक परी का फिर मुझे शैदा किया

रिन्द लखनवी

चढ़ी तेरे बीमार-ए-फ़ुर्क़त को तब है

रिन्द लखनवी

साक़ी-ए-रंगीं-अदा था बादा-ए-गुलफ़ाम था

रशीद शाहजहाँपुरी

साक़ी-ए-रंगीं-अदा था बादा-ए-गुलफ़ाम था

रशीद शाहजहाँपुरी

उड़ती रहती थी सदा ख़ित्ता-ए-वीरान में ख़ाक

राशिद अनवर राशिद

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