रात Poetry (page 8)

है गुलू-गीर बहुत रात की पहनाई भी

यूसुफ़ ज़फ़र

लम्हा लम्हा फैलती जाती है रात

यूसुफ़ तक़ी

दिल में जब कभी तेरी याद सो गई होगी

यूसुफ़ तक़ी

हमें ख़बर थी बचाने का उस में यारा नहीं

यासमीन हमीद

इक बे-पनाह रात का तन्हा जवाब था

यासमीन हमीद

कैसा चेहरा है रात की तफ़्सील

यासमीन हबीब

अभी से अच्छा हुआ रात सो गई वर्ना

यासमीन हबीब

वक़्त बस रेंगता है उम्र के साथ

यासमीन हबीब

किसी कशिश के किसी सिलसिले का होना था

यासमीन हबीब

बारिश रुकी वबाओं का बादल भी छट गया

यासीन अफ़ज़ाल

अगर वो आज रात हद्द-ए-इल्तिफ़ात तोड़ दे

याक़ूब यावर

जो तू नहीं तो मौसम-ए-मलाल भी न आएगा

याक़ूब यावर

सब्र ख़ुद उकता गया अच्छा हुआ

याक़ूब उस्मानी

हुसूल-ए-रिज़्क़ के अरमाँ निकालते गुज़री

याक़ूब तसव्वुर

चंद घंटे शोर ओ ग़ुल की ज़िंदगी चारों तरफ़

याक़ूब आमिर

उस की याद और दर्द की सौग़ात मेरे साथ थी

यहया ख़ालिद

यकसाँ कभी किसी की न गुज़री ज़माने में

यगाना चंगेज़ी

तिरी तलाश में मह की तरह मैं फिरता हूँ

वज़ीर अली सबा लखनवी

वाइ'ज़ के मैं ज़रूर डराने से डर गया

वज़ीर अली सबा लखनवी

वो अपनी उम्र को पहले पिरो लेता है डोरी में

वज़ीर आग़ा

रात भर इक सदा

वज़ीर आग़ा

मुसाफ़िर चलते रहते हैं

वज़ीर आग़ा

बंधन

वज़ीर आग़ा

अंधी काली रात का धब्बा

वज़ीर आग़ा

अब दिन की बातें करते हैं

वज़ीर आग़ा

तिरा ही रूप नज़र आए जा-ब-जा मुझ को

वज़ीर आग़ा

न आँखें ही झपकता है न कोई बात करता है

वज़ीर आग़ा

किस किस से न वो लिपट रहा था

वज़ीर आग़ा

जबीं-ए-संग पे लिक्खा मिरा फ़साना गया

वज़ीर आग़ा

दिन ढल चुका था और परिंदा सफ़र में था

वज़ीर आग़ा

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