रात Poetry (page 7)
कैसी रुकी हुई थी रवानी मिरी तरफ़
ज़फ़र इक़बाल
जहाँ निगार-ए-सहर पैरहन उतारती है
ज़फ़र इक़बाल
हज़ार बंदिश-ए-औक़ात से निकलता है
ज़फ़र इक़बाल
है और बात बहुत मेरी बात से आगे
ज़फ़र इक़बाल
एक ही बार नहीं है वो दोबारा कम है
ज़फ़र इक़बाल
दिन पर सोच सुलगती है या कभी रात के बारे में
ज़फ़र इक़बाल
दिल का ये दश्त अरसा-ए-महशर लगा मुझे
ज़फ़र इक़बाल
देखो तो कुछ ज़ियाँ नहीं खोने के बावजूद
ज़फ़र इक़बाल
चमके गा अभी मेरे ख़यालात से आगे
ज़फ़र इक़बाल
बीनाई से बाहर कभी अंदर मुझे देखे
ज़फ़र इक़बाल
बिजली गिरी है कल किसी उजड़े मकान पर
ज़फ़र इक़बाल
बहुत सुलझी हुई बातों को भी उलझाए रखते हैं
ज़फ़र इक़बाल
बात ऐसी भी कोई नहीं कि मोहब्बत बहुत ज़ियादा है
ज़फ़र इक़बाल
अभी तो करना पड़ेगा सफ़र दोबारा मुझे
ज़फ़र इक़बाल
उजाला अपने घरौंदे में रह गया तो रात
ज़फर इमाम
भले ही आँख मिरी सारी रात जागेगी
ज़फर इमाम
मेरे नाज़ुक सवाल में उतरो
ज़फ़र हमीदी
सिलसिले के बाद कोई सिलसिला रौशन करें
ज़फ़र गोरखपुरी
मिरा क़लम मिरे जज़्बात माँगने वाले
ज़फ़र गोरखपुरी
दिन को भी इतना अंधेरा है मिरे कमरे में
ज़फ़र गोरखपुरी
तिरा यक़ीन हूँ मैं कब से इस गुमान में था
ज़फ़र गौरी
हालत-ए-बीमार-ए-ग़म पर जिस को हैरानी नहीं
ज़फ़र अंसारी ज़फ़र
आ के जब ख़्वाब तुम्हारे ने कहा बिस्मिल्लाह
ज़फ़र अज्मी
किसी के शोख़ बदन की ज़रूरतों की तरह
ज़फ़र अहमद परवाज़
तिरे फ़िराक़ में घुटनों चली है तन्हाई
ज़फ़र अहमद परवाज़
है गुलू-गीर बहुत रात की पहनाई भी
यूसुफ़ ज़फ़र
आ मिरे चाँद रात सूनी है
यूसुफ़ ज़फ़र
ख़बर
यूसुफ़ ज़फ़र
मैं लिपटता रहा हूँ ख़ारों से
यूसुफ़ ज़फ़र
जिस का बदन है ख़ुश्बू जैसा जिस की चाल सबा सी है
यूसुफ़ ज़फ़र
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