रात Poetry (page 5)

इस बज़्म-ए-तसव्वुर में बस यार की बातें हैं

ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर

हैं गर्दिशें भी रवाँ बख़्त के सितारे में

ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर

दिल के बुझते हुए ज़ख़्मों को हवा देता है

ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर

दर्द को ज़ब्त की सरहद से गुज़र जाने दो

ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर

हम भी कहने लगे हैं रात को रात

ज़की तारिक़

बे-मकाँ मेरे ख़्वाब होने लगे

ज़की तारिक़

ये रात यूँही बसर हो गई तो क्या होगा

ज़की काकोरवी

तू ही बता दे कैसे काटूँ

ज़की काकोरवी

तिरी जुस्तुजू तिरी आरज़ू मुझे काम तेरे ही काम से

ज़की काकोरवी

साग़र-ओ-जाम को छलकाओ कि कुछ रात कटे

ज़की काकोरवी

उभरता चाँद सियह रात के परों में था

ज़काउद्दीन शायाँ

रौशनी लटकी हुई तलवार सी

ज़काउद्दीन शायाँ

रात आँसू को तिरी आँख में देखा हम ने

ज़काउद्दीन शायाँ

ख़ाक हम मुँह पे मले आए हैं

ज़काउद्दीन शायाँ

कहाँ दिन रात में रक्खा हुआ हूँ

ज़करिय़ा शाज़

हम तुझ से कोई बात भी करने के नहीं थे

ज़करिय़ा शाज़

देखो घिर कर बादल आ भी सकता है

ज़करिय़ा शाज़

रखी न गई दिल में कोई बात छुपा कर

ज़हरा क़रार

अब तो ये भी होने लगा है हम में उन में बात नहीं

ज़ाहिदुल हक़

आप ने हाथ रक्खा मिरे हात पर

ज़ाहिदुल हक़

मौत

ज़ाहिदा ज़ैदी

हो गए अम्बर-फ़शाँ दोनों-जहाँ मेरे लिए

ज़ाहीदा कमाल

ख़्वाब सितारे होते होंगे लेकिन आँखें रेत

ज़ाहिद शम्सी

कल रात बहुत ज़ोर था साहिल की हवा में

ज़ाहिद मसूद

ज़ख़्मी ख़्वाबों की तीसरी दुनिया

ज़ाहिद इमरोज़

वक़्त के नाम एक ख़त

ज़ाहिद इमरोज़

मेरा ग़ुस्सा कहाँ है?

ज़ाहिद इमरोज़

काएनाती गर्द में बरसात की एक शाम

ज़ाहिद इमरोज़

हर्माफ्रोडाइट

ज़ाहिद इमरोज़

अधूरी मौत कर कर्ब

ज़ाहिद इमरोज़

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