प्रकाश Poetry (page 26)

चाहतों के ख़्वाब की ताबीर थी बिल्कुल अलग

भारत भूषण पन्त

ज़िंदा हूँ इस तरह कि ग़म-ए-ज़िंदगी नहीं

बहज़ाद लखनवी

पर्दे उठे हुए भी हैं उन की इधर नज़र भी है

बेदम शाह वारसी

इस बहर-ए-बे-सदा में कुछ और नीचे जाएँ

बशीर सैफ़ी

नहीं है मेरे मुक़द्दर में रौशनी न सही

बशीर बद्र

गले में उस के ख़ुदा की अजीब बरकत है

बशीर बद्र

वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है

बशीर बद्र

कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो

बशीर बद्र

दुआ करो कि ये पौदा सदा हरा ही लगे

बशीर बद्र

चाय की प्याली में नीली टेबलेट घोली

बशीर बद्र

तिरी निगाह का अंदाज़ क्या नज़र आया

बाक़ी सिद्दीक़ी

दवा बग़ैर कोई तिफ़्ल मर गया तो क्या हुआ

बाक़र नक़वी

गोडो

बाक़र मेहदी

वो रिंद क्या कि जो पीते हैं बे-ख़ुदी के लिए

बाक़र मेहदी

किसी पे कोई भरोसा करे तो कैसे करे

बाक़र मेहदी

हार जाएगी यक़ीनन तीरगी

बलवान सिंह आज़र

रात दिन इक बेबसी ज़िंदा रही

बलवान सिंह आज़र

सर्द, तारीक रात

बलराज कोमल

इत्तिफ़ाक़

बलराज कोमल

शाम उतरी है फिर अहाते में

बकुल देव

अपना बिगड़ा हुआ बनाव लिए

बकुल देव

हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जाँ का हुनर नहीं आया

बख़्श लाइलपूरी

हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जाँ का हुनर नहीं आया

बख़्श लाइलपूरी

वाँ इरादा आज उस क़ातिल के दिल में और है

ज़फ़र

क़दमों से इतना दूर किनारा कभी न था

बद्र-ए-आलम ख़लिश

रौशनी ही रौशनी है शहर में

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

जले हैं दिल न चराग़ों ने रौशनी की है

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

आग ही काश लग गई होती

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

अँधेरा

अज़रा अब्बास

मैं ने चुप के अंधेरे में ख़ुद को रखा इक फ़ज़ा के लिए

अज़्म बहज़ाद

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