साथ Poetry (page 79)

उस की सूरत उस की आँखें उस का चेहरा भूल गए

अनवार हबीब

उदासी एक लड़की है

अनवार फ़ितरत

नाकामी-ए-विसाल का पैग़ाम है मुझे

अनवर देहलवी

गोया कि सब ग़लत हैं मिरी बद-गुमानियाँ

अनवर देहलवी

देखा जो मर्ग तो मरना ज़ियाँ न था

अनवर देहलवी

अश्क बेताब व निगह बे-बाक व चश्म-ए-तर ख़राब

अनवर देहलवी

आँखें दिखाईं ग़ैर को मेरी ख़ता के साथ

अनवर देहलवी

कब लज़्ज़तों ने ज़ेहन का पीछा नहीं किया

अनवर अंजुम

चुप बैठा में अक्सर सोचता रहता हूँ

अनवर अंजुम

उसे यादों में जब लाना मुसलसल कर दिया मैं ने

अनुभव गुप्ता

जुर्म ठहरा हाल से आगे का नक़्शा देखना

अनसर अली अनसर

क्या ख़बर थी कि तिरे साथ ये दुनिया होगी

अंजुम सिद्दीक़ी

माँ की दुआ न बाप की शफ़क़त का साया है

अंजुम सलीमी

जब ख़ुदा भी नहीं था साथ मरे

अंजुम सलीमी

विसाल की तीसरी सम्त

अंजुम सलीमी

मुहाजिर परिंदों का स्वागत

अंजुम सलीमी

मैं और मेरी तन्हाई

अंजुम सलीमी

एक महबूस नज़्म

अंजुम सलीमी

आधी मौत का जन्म

अंजुम सलीमी

ये मोहब्बत का जो अम्बार पड़ा है मुझ में

अंजुम सलीमी

सहर को खोज चराग़ों पे इंहिसार न कर

अंजुम सलीमी

ख़ुद अपने हाथ से क्या क्या हुआ नहीं मिरे साथ

अंजुम सलीमी

कैसी सोहबत है कैसी तन्हाई

अंजुम सलीमी

दिन ले के जाऊँ साथ उसे शाम कर के आऊँ

अंजुम सलीमी

पाप करो जी खोल कर धब्बों की क्या सोच

अंजुम रूमानी

जब भी कोई बात की आँसू ढलके साथ

अंजुम रूमानी

तुझ को दुनिया के साथ चलना है

अंजुम रहबर

आग बहते हुए पानी में लगाने आई

अंजुम रहबर

ज़िंदगी अपनी क़रीने से बसर होती नहीं

अंजुम नियाज़ी

अँधेरी रात है साया तो हो नहीं सकता

अंजुम ख़याली

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