शहर Poetry (page 30)

आज शायद ज़िंदगी का फ़ल्सफ़ा समझा हूँ मैं

सलीम शुजाअ अंसारी

न छीन ले कहीं तन्हाई डर सा रहता है

सालिम सलीम

हुदूद-ए-शहर-ए-तिलिस्मात से नहीं निकला

सालिम सलीम

हंगामा-ए-सुकूत बपा कर चुके हैं हम

सालिम सलीम

इक नए शहर-ए-ख़ुश-ए-आसार की बीमारी है

सालिम सलीम

डरता रहता हूँ हम-नशीनों में

सालिक लखनवी

ख़्वाहिश-ए-तख़्त न अब दिरहम-ओ-दीनार की गूँज

सलीम सिद्दीक़ी

रहा वो शहर में जब तक बड़ा दबंग रहा

सलीम शहज़ाद

ज़ुल्मत है तो फिर शो'ला-ए-शब-गीर निकालो

सलीम शाहिद

ये फ़ैसला भी मिरे दस्त-ए-बा-कमाल में था

सलीम शाहिद

वो ख़ूँ बहा कि शहर का सदक़ा उतर गया

सलीम शाहिद

तर्ज़-ए-इज़हार में कोई तो नया-पन होता

सलीम शाहिद

फिर कोई महशर उठाने मेरी तन्हाई में आ

सलीम शाहिद

मत पूछ हर्फ़-ए-दर्द की तफ़्सीर कुछ भी हो

सलीम शाहिद

ख़्वाहिश को अपने दर्द के अंदर समेट ले

सलीम शाहिद

घर के दरवाज़े खुले हों चोर का खटका न हो

सलीम शाहिद

अब शहर की और दश्त की है एक कहानी

सलीम शाहिद

तू ने देखा नहीं इक शख़्स के जाने से 'सलीम'

सलीम कौसर

कैसे हंगामा-ए-फ़ुर्सत में मिले हैं तुझ से

सलीम कौसर

साल की आख़िरी शब

सलीम कौसर

न कोई नाम ओ नसब है न गोश्वारा मिरा

सलीम कौसर

कुछ भी था सच के तरफ़-दार हुआ करते थे

सलीम कौसर

कैसे हंगामा-ए-फ़ुर्सत में मिले हैं तुझ से

सलीम कौसर

इक घड़ी वस्ल की बे-वस्ल हुई है मुझ में

सलीम कौसर

दिल-ए-सीमाब-सिफ़त फिर तुझे ज़हमत दूँगा

सलीम कौसर

चश्म बे-ख़्वाब हुई शहर की वीरानी से

सलीम कौसर

बस इक रस्ता है इक आवाज़ और एक साया है

सलीम कौसर

अब फ़ैसला करने की इजाज़त दी जाए

सलीम कौसर

आब ओ हवा है बरसर-ए-पैकार कौन है

सलीम कौसर

ग़मों की आग पे सब ख़ाल-ओ-ख़द सँवारे गए

सलीम फ़िगार

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