शहर Poetry (page 29)

मैं फ़र्त-ए-मसर्रत से डर है कि न मर जाऊँ

सरदार सोज़

कभी सुर्ख़ी से लिखता हूँ कभी काजल से लिखता हूँ

सरदार सलीम

एक ही ज़िंदा बचा है ये निराला पागल

सरदार सलीम

आज दीवाने का ज़ौक़-ए-दीद पूरा हो गया

सरदार सलीम

ये ख़ल्क़ सारी हवा मेरे नाम कर देगी

सदार आसिफ़

परिंदा कमरे में रह गया

सारा शगुफ़्ता

मैं अपने शहर से मायूस हो के लौट आया

साक़ी फ़ारुक़ी

घर

साक़ी फ़ारुक़ी

यहीं कहीं पे कभी शोला-कार मैं भी था

साक़ी फ़ारुक़ी

शहर का शहर हुआ जान का प्यासा कैसा

साक़ी फ़ारुक़ी

पाँव मारा था पहाड़ों पे तो पानी निकला

साक़ी फ़ारुक़ी

लोग थे जिन की आँखों में अंदेशा कोई न था

साक़ी फ़ारुक़ी

ख़्वाब को दिन की शिकस्तों का मुदावा न समझ

साक़ी फ़ारुक़ी

जान प्यारी थी मगर जान से बे-ज़ारी थी

साक़ी फ़ारुक़ी

हिरास फैल गया है ज़मीन-दानों में

साक़ी फ़ारुक़ी

मज़हब की किताबों में भी इरशाद हुआ मैं

संजय मिश्रा शौक़

ख़राब हो गया जब मेरे जिस्म का काग़ज़

संजय मिश्रा शौक़

अमीर-ए-शहर के आँगन में जब उजाले हुए

संजय मिश्रा शौक़

वो गुम हुए हैं मुसाफ़िर रह-ए-तमन्ना में

समद अंसारी

वो आरज़ू कि दिलों को उदास छोड़ गई

समद अंसारी

उतरे तिलिस्म शब के उजालों पे रात-भर

समद अंसारी

रौशनी तक रौशनी का रास्ता कह लीजिए

समद अंसारी

अपनी लौ में कोई डूबा ही नहीं

समद अंसारी

आहटों से दिमाग़ जलता है

समद अंसारी

जब शाम शहर में आती है

सलमान सईद

बग़दाद

सलमान अंसारी

क्या नहीं जानता मुझे कोई

सलमान अख़्तर

रह गया कम ही गो सफ़र बाक़ी

सलमान अख़्तर

हम जो पहले कहीं मिले होते

सलमान अख़्तर

ज़ब्त की हद से गुज़र कर ख़ार तो होना ही था

सलीम शुजाअ अंसारी

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