शहर Poetry (page 31)

ग़मों की आग पे सब ख़ाल-ओ-ख़द सँवारे गए

सलीम फ़िगार

वो तीरगी-ए-शब है कि घर लौट गए हैं

सलीम फ़राज़

उसे ख़ुद को बदल लेना गवारा भी नहीं होता

सलीम फ़राज़

कुछ नए ख़्वाब हर इक फ़स्ल में पाले गए हैं

सलीम फ़राज़

फ़स्ल-ए-जुनूँ में दामन-ओ-दिल चाक भी नहीं

सलीम फ़राज़

उस मुल्क में भी लोग क़यामत के हैं मुंकिर

सलीम बेताब

फूलों की है तख़्लीक़ कि शो'लों से बना है

सलीम बेताब

पड़ा हुआ मैं किसी आइने के घर में हूँ

सलीम बेताब

ख़ुद अपने अक्स को हैरत से देखता हूँ मैं

सलीम बेताब

जी में आता है कि इक रोज़ ये मंज़र देखें

सलीम बेताब

आँख के कुंज में इक दश्त-ए-तमन्ना ले कर

सलीम बेताब

आग सी बरसती है सब्ज़ सब्ज़ पत्तों से

सलीम बेताब

शजर तो कब का कट के गिर चुका है

सलीम अंसारी

निकल गए हैं जो बादल बरसने वाले थे

सलीम अहमद

कोई नहीं जो पता दे दिलों की हालत का

सलीम अहमद

सफ़र

सलीम अहमद

एक दरवाज़े पर

सलीम अहमद

ज़िंदगी मौत के पहलू में भली लगती है

सलीम अहमद

स्वाँग भरता हूँ तिरे शहर में सौदाई का

सलीम अहमद

मैं सर छुपाऊँ कहाँ साया-ए-नज़र के बग़ैर

सलीम अहमद

लम्हा-ए-रफ़्ता का दिल में ज़ख़्म सा बन जाएगा

सलीम अहमद

किन नक़ाबों में है मस्तूर वो हुस्न-ए-मा'सूम

सलीम अहमद

जो आँखों के तक़ाज़े हैं वो नज़्ज़ारे बनाता हूँ

सलीम अहमद

इश्क़ और इतना मोहज़्ज़ब छोड़ कर दीवाना-पन

सलीम अहमद

आँसू हूँ हँस रहा हूँ शगूफ़ों के दरमियाँ

सलाम मछली शहरी

सड़क बन रही है

सलाम मछली शहरी

बहुत दिनों की बात है....

सलाम मछली शहरी

तुम्हें मिरे ख़याल की मुसव्विरी क़ुबूल हो

सलाम मछली शहरी

फूलों के देस चाँद सितारों के शहर में

सलाम मछली शहरी

मैं तो कहता हूँ तुम्ही दर्द के दरमाँ हो ज़रूर

सलाम मछली शहरी

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