शहर Poetry (page 28)

कब बन-बास कटे इस शहर के लोगों का

सत्तार सय्यद

यूँ एहतिमाम-ए-रद्द-ए-सहर कर दिया गया

सत्तार सय्यद

चमके दूरी में कुछ अक्स निशानों के

सत्तार सय्यद

सवाब की दुआओं ने गुनाह कर दिया मुझे

सरवत ज़ेहरा

सहर-ओ-शाम में तंज़ीम कहाँ होती है

सरवर अरमान

रौशनी से तीरगी ताबीर कर दी जाएगी

सरवर अरमान

इन आँखों में कई सपने कई अरमान थे लेकिन

सरवर अरमान

आशिक़ी की ख़ैर हो 'सरवर' कि अब इस शहर में

सरवर आलम राज़

जिस क़दर शिकवे थे सब हर्फ़-ए-दुआ होने लगे

सरवर आलम राज़

बयान क़िस्सा-ए-बेचारगी किया जाए

सरवर आलम राज़

ये इंतिहा-ए-मसर्रत का शहर है 'सरवत'

सरवत हुसैन

सुब्ह के शहर में इक शोर है शादाबी का

सरवत हुसैन

यक-ब-यक मंज़र-ए-हस्ती का नया हो जाना

सरवत हुसैन

थामी हुई है काहकशाँ अपने हाथ से

सरवत हुसैन

सफ़ीना रखता हूँ दरकार इक समुंदर है

सरवत हुसैन

कभी तेग़-ए-तेज़ सुपुर्द की कभी तोहफ़ा-ए-गुल-ए-तर दिया

सरवत हुसैन

जाने उस ने क्या देखा शहर के मनारे में

सरवत हुसैन

गदा-ए-शहर-ए-आइंदा तही-कासा मिलेगा

सरवत हुसैन

इक रोज़ मैं भी बाग़-ए-अदन को निकल गया

सरवत हुसैन

आँखों में सौग़ात समेटे अपने घर आते हैं

सरवत हुसैन

हमारे लिए सुब्ह के होंट पर बद-दुआ' है

सरमद सहबाई

नींद से जागी हुई आँखों को अंधा कर दिया

सरमद सहबाई

हम अपने शहर से हो कर उदास आए थे

सरफ़राज़ नवाज़

ये मैं ने माना कि पहरा है सख़्त रातों का

सरफ़राज़ नवाज़

मौसमों वाले नए दाना ओ पानी वाले

सरफ़राज़ नवाज़

किसे ख़बर थी कि इस को भी टूट जाना था

सरफ़राज़ नवाज़

सुनते हैं बयाबाँ भी कभी शहर रहा था

सरफ़राज़ ख़ालिद

मैं तो अब शहर में हूँ और कोई रात गए

सरफ़राज़ ख़ालिद

ताबिश-ए-गेसू-ए-ख़मदार लिए फिरता है

सरफ़राज़ ख़ालिद

सहरा कोई बस्ती कोई दरिया है कि तुम हो

सरफ़राज़ ख़ालिद

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