शहर Poetry (page 39)
खंडर में दफ़्न हुई हैं इमारतें क्या क्या
रासिख़ इरफ़ानी
अँधेरों में उजाले खो रहे हैं
रासिख़ इरफ़ानी
दोस्त के शहर में जब मैं पहुँचा शहर का मंज़र अच्छा था
रासिख़ फारानी
ख़िज़ाँ की बात न ज़िक्र-ए-बहार करते हैं
रशक खलीली
किस की आँखों की हिदायत से मुझे देखता है
राशिद तराज़
कभी यूँ भी करो शहर-ए-गुमाँ तक ले चलो मुझ को
राशिद तराज़
कोई रस्ता कोई रहरव कोई अपना नहीं मिलता
राशिद क़य्यूम अनसर
लोग कि जिन को था बहुत ज़ोम-ए-वजूद शहर में
राशिद मुफ़्ती
कुछ यूँ भी मुझे रास हैं तन्हाइयाँ अपनी
राशिद मुफ़्ती
हवा के लम्स से भड़का भी हूँ मैं
राशिद मुफ़्ती
ग़नीमत है हँस कर अगर बात की
राशिद मुफ़्ती
दुनिया में है यूँ तो कौन बे-ग़म
राशिद मुफ़्ती
दर्द की हद से गुज़रना तो अभी बाक़ी है
राशिद कामिल
ये वाक़िआ तो लगे है सुना हुआ सा कुछ
राशिद जमाल फ़ारूक़ी
तमाम क़ज़िया मकान भर था
राशिद जमाल फ़ारूक़ी
मुसाहिबत का कोई सिलसिला नहीं है क्या
राशिद अनवर राशिद
तेरी मेहंदी में मिरे ख़ूँ की महक आ जाए
राशिद अमीन
वक़्त वक़्त की बात है
राशिद आज़र
वही तअल्लुक़-ए-ख़ातिर जो बर्क़-ओ-बाद में है
राशिद आज़र
सुब्ह-ए-क़यामत जिन होंटों पे दिलासे देखे
राशिद आज़र
साया था मेरा और मिरे शैदाइयों में था
राशिद आज़र
रुके हुए हैं जो दरिया उन्हें रवानी दे
रशीदुज़्ज़फ़र
ये ज़ाविया सूरज का बदल जाएगा साईं
रशीद क़ैसरानी
तन्हाइयों का हब्स मुझे काटता रहा
रशीद क़ैसरानी
तन्हाइयों का हब्स मुझे काटता रहा
रशीद क़ैसरानी
नाम हमारा दुनिया वाले लिखेंगे जी-दारों में
रशीद क़ैसरानी
मुँह किस तरह से मोड़ लूँ ऐसे पयाम से
रशीद क़ैसरानी
कुछ साए से हर लहज़ा किसी सम्त रवाँ हैं
रशीद क़ैसरानी
कुछ साए से हर लहज़ा किसी सम्त रवाँ हैं
रशीद क़ैसरानी
बात सूरज की कोई आज बनी है कि नहीं
रशीद क़ैसरानी
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