शहर Poetry (page 37)

सफ़र में रस्ता बदलने के फ़न से वाक़िफ़ है

रेहाना रूही

नींद आँखों में मुसलसल नहीं होने देता

रेहाना रूही

कौन कहाँ तक जा सकता है

रेहाना रूही

दिल को रह रह के ये अंदेशे डराने लग जाएँ

रेहाना रूही

हसीन दुनिया उजड़ गई तो

रेहान अल्वी

हर आने वाले पल से डर रहा हूँ

रज़्ज़ाक़ अरशद

दिल के दर्द के कम होने का तन्हा कुछ सामान हुआ

रज़िया फ़सीह अहमद

ख़्वाब-फ़रोश

रज़ी रज़ीउद्दीन

शब-ए-दराज़ तुझे कुछ ख़बर गई कि नहीं

रज़ी रज़ीउद्दीन

हक़ीक़तों का पता दे के ख़ुद सराब हुआ

रज़ी मुजतबा

वो जंग मैं ने महाज़-ए-अना पे हारी है

राज़ी अख्तर शौक़

संग हैं नावक-ए-दुश्नाम हैं रुस्वाई है

राज़ी अख्तर शौक़

सलामत आए हैं फिर उस के कूचा-ओ-दर से

राज़ी अख्तर शौक़

सफ़र कठिन ही सही क्या अजब था साथ उस का

राज़ी अख्तर शौक़

फिर जो देखा दूर तक इक ख़ामुशी पाई गई

राज़ी अख्तर शौक़

न फ़ासले कोई रखना न क़ुर्बतें रखना

राज़ी अख्तर शौक़

ख़्वाबों की इक भीड़ लगी है जिस्म बेचारा नींद में है

राज़ी अख्तर शौक़

कैसे कटे क़सीदा-गो हर्फ़-गरों के दरमियाँ

राज़ी अख्तर शौक़

कैसे इस शहर में रहना होगा

राज़ी अख्तर शौक़

जाने क्या है जिसे देखो वही दिल-गीर लगे

राज़ी अख्तर शौक़

इन्ही गलियों में इक ऐसी गली है

राज़ी अख्तर शौक़

दिन का मलाल शाम की वहशत कहाँ से लाएँ

राज़ी अख्तर शौक़

छेड़ के साज़-ए-ज़रगरी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा है रक़्स में

राज़ी अख्तर शौक़

बिछड़ते वक़्त तो कुछ उस में ग़म-गुसारी थी

राज़ी अख्तर शौक़

ऐ सुब्ह-ए-उमीद देर क्या है

राज़ी अख्तर शौक़

अब सफ़र हो तो कोई ख़्वाब-नुमा ले जाए

राज़ी अख्तर शौक़

आवार्गान-ए-शौक़ सभी घर के हो गए

राज़ी अख्तर शौक़

आए हम शहर-ए-ग़ज़ल में तो इस आग़ाज़ के साथ

राज़ी अख्तर शौक़

रैलियाँ ही रैलियाँ

रज़ा नक़वी वाही

गोया थे तो कोई भी नहीं था

रज़ा हमदानी

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