शहर Poetry (page 35)

नहीं मा'लूम जीने का हुनर कैसा रखा है

सादिया सफ़दर सादी

सुकूत-ए-मर्ग में क्यूँ राह-ए-नग़्मा-गर देखूँ

सादिक़ नसीम

रश्क-ए-महताब जहाँ-ताब था हर क़र्या-ए-जाँ

सादिक़ नसीम

जब भी तिरी क़ुर्बत के कुछ इम्काँ नज़र आए

सादिक़ नसीम

इस एहतिमाम से परवाने पेशतर न जले

सादिक़ नसीम

अज़ाबों का शहर

सादिक़

पलंग पर जो किताब ओ सिनान रख देगा

सादिक़

रास्ते फैले हुए जितने भी थे पत्थर के थे

सदफ़ जाफ़री

लफ़्ज़ों को सजा कर जो कहानी लिखना

सदफ़ जाफ़री

चाँद गुम-सुम चमकता हुआ और मैं

सदफ़ जाफ़री

न ज़िक्र गुल का कहीं है न माहताब का है

सदा अम्बालवी

न ज़िक्र गुल का कहीं है न माहताब का है

सदा अम्बालवी

जब भी पढ़ा है शाम का चेहरा वरक़ वरक़

साबिर ज़ाहिद

सर-ए-शाम लुट चुका हूँ सर-ए-आम लुट चुका हूँ

साबिर ज़फ़र

नए कपड़े बदल और बाल बना तिरे चाहने वाले और भी हैं

साबिर ज़फ़र

बना हुआ है मिरा शहर क़त्ल-गाह कोई

साबिर ज़फ़र

वाक़िफ़ ख़ुद अपनी चश्म-ए-गुरेज़ाँ से कौन है

साबिर ज़फ़र

नज़र आते नहीं हैं बहर में हम

साबिर ज़फ़र

नए कपड़े बदल और बाल बना तिरे चाहने वाले और भी हैं

साबिर ज़फ़र

किसी तौर हो न पिन्हाँ तिरा रंग-ए-रू-सियाही

साबिर ज़फ़र

जिधर हो ज़िंदगी मुश्किल उधर नहीं आते

साबिर ज़फ़र

अब कहीं और कहाँ ख़ाक-बसर हों तिरे बंदे जा कर

साबिर ज़फ़र

वो धूप वो गलियाँ वही उलझन नज़र आए

साबिर वसीम

तमाम मोजज़े सारी शहादतें ले कर

साबिर वसीम

राह में शहर-ए-तरब याद आया

साबिर वसीम

असीर-ए-शाम हैं ढलते दिखाई देते हैं

साबिर वसीम

तेरी याद मेरी भूल

साबिर दत्त

फ़नकार

साबिर दत्त

मुझ से पहले मिरे वतीरे देख

साबिर अदीब

यहाँ पे हँसना रवा है रोना है बे-हयाई

साबिर

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