शहर Poetry (page 36)
तुम्हारे आलम से मेरा आलम ज़रा अलग है
साबिर
दुरुस्त है कि ये दिन राएगाँ नहीं गुज़रे
सबिहा सबा, न्यूयार्क
इन पत्थरों के शहर में दिल का गुज़र कहाँ
सबा इकराम
है जो दरवेश वो सुल्ताँ है ये मा'लूम हुआ
सबा अकबराबादी
आँखों से वो कभी मिरी ओझल नहीं रहा
सअादत सईद
बनते ही शहर का ये देखिए वीराँ होना
एस ए मेहदी
ये किस हसीन ने लोगों को रोक रक्खा है
रूही कंजाही
मोजज़ा कोई दिखाऊँ भी तो क्या
रूही कंजाही
अब तो यूँ लब पे मिरे हर्फ़-ए-सदाक़त आए
रूही कंजाही
दिल जो घबराया तो उठ कर दोस्तों में आ गया
रियाज़ साग़र
गाए
रियाज़ लतीफ़
एक न्यूक्लेयर नज़्म
रियाज़ लतीफ़
वही तवील सी राहें सफ़र वही तन्हा
ऋषि पटियालवी
उदास उदास थे हम उस को इक ज़माना हुआ
रिन्द साग़री
सबा गुलों की हर इक पंखुड़ी सँवारती है
रिन्द साग़री
काबे को जाता किस लिए हिन्दोस्तान से मैं
रिन्द लखनवी
क्यूँ-कर न लाए रंग गुलिस्ताँ नए नए
रिन्द लखनवी
आफ़त शब-ए-तन्हाई की टल जाए तो अच्छा
रिन्द लखनवी
रहा असीर कई साल नक़्श-ए-पा की तरह
रिफ़अत सुलतान
मोहब्बत में वफ़ा वालों को कब ईज़ा सताती है
रिफ़अत सेठी
न कोई दोस्त न दुश्मन अजीब दुनिया है
रिफ़अत सरोश
चाहतों का जो शजर है दोस्तो
रिफ़अत अल हुसैनी
उस चाँद को तुम दिल में छुपा क्यूँ नहीं लेते
रियाज़ हान्स
यही दुआ है यही है सलाम इश्क़ ब-ख़ैर
रहमान फ़ारिस
सर-ब-सर यार की मर्ज़ी पे फ़िदा हो जाना
रहमान फ़ारिस
क्यूँ तिरे साथ रहीं उम्र बसर होने तक
रहमान फ़ारिस
तख़्लीक़ किसे कहते हैं है अज़्मत-ए-फ़न क्या
रहबर जौनपूरी
अंजाम-ए-इंतिहा-ए-सफ़र देखते चलें
रहबर जौनपूरी
वो मुंतज़िर हैं हमारे तो हम किसी के हैं
रेहाना रूही
शब-ओ-रोज़ रक़्स-ए-विसाल था सो नहीं रहा
रेहाना रूही
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