शहर Poetry (page 38)

ये किस मक़ाम पे ठहरा है कारवान-ए-वफ़ा

रज़ा हमदानी

हर एक घर का दरीचा खुला है मेरे लिए

रज़ा हमदानी

हर अक्स ख़ुद एक आइना है

रज़ा हमदानी

चढ़ते हुए दरिया की अलामत नज़र आए

रज़ा हमदानी

टुक तू महमिल का निशाँ दे जल्द ऐ सूरत ज़रा

रज़ा अज़ीमाबादी

इस तरह बज़्म में वस्फ़-ए-रुख़-ए-जानाना करूँ

रज़ा अज़ीमाबादी

अब्र के बिन देखे हरगिज़ ख़ुश दिल-ए-मस्ताँ न हो

रज़ा अज़ीमाबादी

सवाद-ए-शहर में थोड़ी सी ये जो जन्नत है

रज़ा अश्क

पचास सालों में दो इक बरस का रिश्ता था

रज़ा अश्क

दिल में झाँका तो बहुत ज़ख़्म पुराने निकले

रज़ा अमरोही

बुतान-ए-शहर को ये ए'तिराफ़ हो कि न हो

रविश सिद्दीक़ी

लगी है भीड़ बड़ा मय-कदे का नाम भी है

रविश सिद्दीक़ी

ख़िरद को गुमशुदा-ए-कू-ब-कू समझते हैं

रविश सिद्दीक़ी

अहद-ओ-पैमाँ कर के पैमाने के साथ

रविश सिद्दीक़ी

गली गली में तकल्लुफ़ की धूल होती है

रौनक़ नईम

ब-नाम-ए-पैकर-ख़ाकी न गर्द बन जाओ

रौनक़ दकनी

चाक दामन भी हुआ चाक-ए-गरेबाँ की तरह

रऊफ़ यासीन जलाली

उस का ख़याल आते ही मंज़र बदल गया

रउफ़ रज़ा

तुम भी इस सूखते तालाब का चेहरा देखो

रउफ़ रज़ा

कुछ अजब सा हूँ सितमगर मैं भी

रउफ़ रज़ा

जो भी कुछ अच्छा बुरा होना है जल्दी हो जाए

रउफ़ रज़ा

रस्ते में तो ख़तरात की सुन-गुन भी बहुत है

रऊफ़ ख़ैर

बिकती नहीं फ़क़ीर की झोली ही क्यूँ न हो

रऊफ़ ख़ैर

आँखों प अभी तोहमत-ए-बीनाई कहाँ है

रऊफ़ ख़ैर

मिरी दिन के उजालों पर नज़र है

रसूल साक़ी

लाव-लश्कर जाह-ओ-हशमत है यहाँ

रसूल साक़ी

घर से निकल के आए हैं बाज़ार के लिए

रसूल साक़ी

अटा है शहर बारूदी धुएँ से

रासिख़ इरफ़ानी

साया सा इक ख़याल की पहनाइयों में था

रासिख़ इरफ़ानी

मैं जंग जीत के जब्र-ओ-अना की हार गया

रासिख़ इरफ़ानी

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