शहर Poetry (page 41)

अब के इस तरह तिरे शहर में खोए जाएँ

राम रियाज़

किस ने कहा था शहर में आ कर आँख लड़ाओ दीवारों से

राम प्रकाश राही

फिर कोई ख़लिश नज़्द-ए-राग-ए-जाँ तो नहीं है

राम कृष्ण मुज़्तर

मुझे मिली है अगर इन्फ़िरादियत की सनद

राम दास

मैं कैसे तय करूँ बे-सम्त रास्तों का सफ़र

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर

ये ज़ख़्म ज़ख़्म बदन और नम फ़ज़ाओं में

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर

क़सीदा फ़त्ह का दुश्मन की तलवारों पे लिक्खा है

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर

मैं खो गया था कोई शय तलाश करते हुए

राकिब मुख़्तार

चराग़ बुझने लगे और छाई तारीकी

राकिब मुख़्तार

वो बात बात पे जी भर के बोलने वाला

राजेन्द्र मनचंदा बानी

तमाम रास्ता फूलों भरा है मेरे लिए

राजेन्द्र मनचंदा बानी

सियाह-ख़ाना-ए-उम्मीद-ए-राएगाँ से निकल

राजेन्द्र मनचंदा बानी

सफ़र है मिरा अपने डर की तरफ़

राजेन्द्र मनचंदा बानी

क़दम ज़मीं पे न थे राह हम बदलते क्या

राजेन्द्र मनचंदा बानी

कोई भूली हुई शय ताक़-ए-हर-मंज़र पे रक्खी थी

राजेन्द्र मनचंदा बानी

इधर की आएगी इक रौ उधर की आएगी

राजेन्द्र मनचंदा बानी

गुज़र रहा हूँ सियह अंधे फ़ासलों से मैं

राजेन्द्र मनचंदा बानी

दिलों में ख़ाक सी उड़ती है क्या न जाने क्या

राजेन्द्र मनचंदा बानी

देखता था मैं पलट कर हर आन

राजेन्द्र मनचंदा बानी

ख़ज़ाना कौन सा उस पार होगा

राजेश रेड्डी

तुम्हारी याद

राजेन्द्र नाथ रहबर

यूँ जो ढूँडो तो यहाँ शहर में अन्क़ा निकले

रजब अली बेग सुरूर

तर्क जिस दिन से किया हम ने शकेबाई का

रजब अली बेग सुरूर

जमाल-ज़ादा

राजा मेहदी अली ख़ाँ

आख़िरी गाली

राजा मेहदी अली ख़ाँ

टूटी हुई दीवार की तक़दीर बना हूँ

राज नारायण राज़

शामिल तू मिरे जिस्म मैं साँसों की तरह है

रईस सिद्दीक़ी

सभी अंधेरे समेटे हुए पड़े रहना

रईस सिद्दीक़ी

किसी का जिस्म हुआ जान-ओ-दिल किसी के हुए

रईस सिद्दीक़ी

रेत का शहर

रईस फ़रोग़

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