शहर Poetry (page 82)

रोके से कहीं हादसा-ए-वक़्त रुका है

अली अहमद जलीली

तुम जो आओगे तो मौसम दूसरा हो जाएगा

अली अहमद जलीली

रोके से कहीं हादसा-ए-वक़्त रुका है

अली अहमद जलीली

वरक़ है मेरे सहीफ़े का आसमाँ क्या है

अली अब्बास उम्मीद

मैं फिर रहा हूँ शहर में सड़कों पे ग़ालिबन

अलीम सबा नवेदी

नाज़िल हुआ था शहर में काला अज़ाब एक

अलीम सबा नवेदी

मैं जिस का मुंतज़िर हूँ वो मंज़र पुकार ले

अलीम सबा नवेदी

लब क्या खुले कि क़ुव्वत-ए-गोयाई छिन गई

अलीम सबा नवेदी

हर मोड़ पे सफ़र था अजब बोलने न पाए

अलीम सबा नवेदी

भीड़ के ख़ौफ़ से फिर घर की तरफ़ लौट आया

अलीम मसरूर

इक जुनूँ कहिए उसे जो मिरे सर से निकला

अलीम मसरूर

करना पड़ा था जिस के लिए ये सफ़र मुझे

अलीम अफ़सर

शोरीदगी को हैं सभी आसूदगी नसीब

आलमताब तिश्ना

मिरी दस्तरस में है गर क़लम मुझे हुस्न-ए-फ़िक्र-ओ-ख़याल दे

आलमताब तिश्ना

मैं अपनी जंग में तन-ए-तन्हा शरीक था

आलमताब तिश्ना

किस किस से दोस्ती हुई ये ध्यान में नहीं

आलमताब तिश्ना

गिनती में बे-शुमार थे कम कर दिए गए

आलमताब तिश्ना

असीर-ए-दश्त-ए-बला का न माजरा कहना

आलमताब तिश्ना

अहद-ए-कम-कोशी में ये भी हौसला मैं ने किया

आलमताब तिश्ना

ज़रा सी धूप ज़रा सी नमी के आने से

आलम ख़ुर्शीद

जल बुझा हूँ मैं मगर सारा जहाँ ताक में है

आलम ख़ुर्शीद

बस एक तिरे ख़्वाब से इंकार नहीं है

आलम ख़ुर्शीद

हब्स-ए-दरूँ पे जिस्म-ए-गिराँ-बार संग था

अकरम नक़्क़ाश

ज़िंदगी का वक़्फ़ा

अख़्तर-उल-ईमान

उरूस-उल-बिलाद

अख़्तर-उल-ईमान

तब्दीली

अख़्तर-उल-ईमान

बाज़-आमद --- एक मुन्ताज

अख़्तर-उल-ईमान

वो कम-नसीब जो अहद-ए-जफ़ा में रहते हैं

अख़्तर ज़ियाई

इरफ़ान-ओ-आगही के सज़ा-वार हम हुए

अख़्तर ज़ियाई

तिरे बग़ैर मसाफ़त का ग़म कहाँ कम है

अख्तर शुमार

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