शहर Poetry (page 9)

यार उठ गए दुनिया से अग़्यार की बारी है

वली उज़लत

वो क्या दिन थे जो क़ातिल-बिन दिल-ए-रंजूर रो देता

वली उज़लत

नंग नहीं मुझ को तड़पने से सँभल जाने का

वली उज़लत

जुनूँ-आवर शब-ए-महताब थी पी की तमन्ना में

वली उज़लत

अरे उल्टे ज़माने मुझ पे क्या सीधा सितम लाया

वली उज़लत

हुस्न पर बोझ हुए उस के ही वा'दे अब तो

वली आलम शाहीन

हमारे शहर में अब हर तरफ़ वहशत बरसती है

वाली आसी

वो सूरतें जो बड़ी शोख़ हैं सजीली हैं

वाली आसी

तुझ से बिछड़ के यूँ तो बहुत जी उदास है

वाली आसी

जी का जंजाल है इश्क़ मियाँ क़िस्सा ये तमाम करो 'वाली'

वाली आसी

बहुत दिन से कोई मंज़र बनाना चाहते हैं हम

वाली आसी

अपनी ना-कर्दा-गुनाही की सज़ा हो जैसे

वकील अख़्तर

जा बैठते हो ग़ैरों में ग़ैरत नहीं आती

वाजिद अली शाह अख़्तर

अल्लाह ऐ बुतो हमें दिखलाए लखनऊ

वाजिद अली शाह अख़्तर

सुरूर-अफ़्ज़ा हुई आख़िर शराब आहिस्ता आहिस्ता

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

आरियों की पहली आमद हिन्दोस्तान में

वहीदुद्दीन सलीम

अपना नफ़स नफ़स है कि शो'ला कहें जिसे

वाहिद प्रेमी

हर एक गाम पे सज्दा यहाँ रवा होगा

वहीदा नसीम

ज़माने फिर नए साँचे में ढलने वाला है

वहीद क़ुरैशी

जिधर निगाह उठी खिंच गई नई दीवार

वहीद क़ुरैशी

आइए जल्वा-ए-दीदार के दिखलाने को

वहीद इलाहाबादी

पत्थरों का मुग़न्नी

वहीद अख़्तर

सहराओं में दरिया भी सफ़र भूल गया है

वहीद अख़्तर

कोई बस्ती कि मुझ में बस्ती है

वहीद अहमद

ये कश्मकश-ए-मुनइ'म-ओ-नादार कहाँ तक

वफ़ा सिद्दीक़ी

तुम ने हमारा साथ दिया तो ख़ुद को हम पा जाएँगे

विश्वनाथ दर्द

हम ने घटता-बढ़ता साया पग-पग चल कर देखा है

विश्वनाथ दर्द

अब हम चराग़ बन के सर-ए-राह जल उठे

विश्वनाथ दर्द

फ़सील-ए-शब पे तारों ने लिखा क्या

विकास शर्मा राज़

रही है यूँ ही नदामत मुझे मुक़द्दर से

विजय शर्मा अर्श

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