मांग Poetry (page 23)

हर गाम पे आवारगी-ओ-दर-ब-दरी में

बशीर अहमद बशीर

रुश्द-ए-बातिन की तलब है तो कर ऐ शैख़ वो काम

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

सर-ए-राहगुज़र एक मंज़र

बलराज कोमल

जो है चश्मा उसे सराब करो

बकुल देव

पड़े हैं राह में जो लोग बे-सबब कब से

बख़्श लाइलपूरी

मिरे हर लफ़्ज़ की तौक़ीर रहने के लिए है

बख़्श लाइलपूरी

चुप थे जो बुत सवाल ब-लब बोलने लगे

बद्र-ए-आलम ख़लिश

कब बयाबाँ राह में आया ये समझा ही नहीं

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

बे-ख़ुदा होने के डर में बे-सबब रोता रहा

अज़रा परवीन

अगर दश्त-ए-तलब से दश्त-ए-इम्कानी में आ जाते

अज़्म शाकरी

दिल सोया हुआ था मुद्दत से ये कैसी बशारत जागी है

अज़्म बहज़ाद

बहुत क़रीने की ज़िंदगी थी अजब क़यामत में आ बसा हूँ

अज़्म बहज़ाद

लम्हों ने यूँ समेट लिया फ़ासला बहुत

अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

जहाँ में हम जिसे भी प्यार के क़ाबिल समझते हैं

अज़ीज़ वारसी

सिफ़र

अज़ीज़ तमन्नाई

बढ़ने दे अभी कशमकश-ए-तार-ए-नफ़स और

अज़ीज़ तमन्नाई

ये किस मक़ाम पे लाया गया ख़ुदाया मुझे

अज़ीज़ नबील

मैं अपने गिर्द लकीरें बिछाए बैठा हूँ

अज़ीज़ नबील

इस बार हवाओं ने जो बेदाद-गरी की

अज़ीज़ नबील

धूप के जाते ही मर जाऊँगा मैं

अज़ीज़ नबील

दर्द सहने के लिए सदमे उठाने के लिए

अज़ीज़ हैदराबादी

शहर जिन के नाम से ज़िंदा था वो सब उठ गए

अज़ीज़ हामिद मदनी

ज़ंजीर-ए-पा से आहन-ए-शमशीर है तलब

अज़ीज़ हामिद मदनी

आतिश-ए-मीना नज़र आई हरीफ़ाना मुझे

अज़ीज़ हामिद मदनी

आज मुक़ाबला है सख़्त मीर-ए-सिपाह के लिए

अज़ीज़ हामिद मदनी

जल्वे हवा के दोश ये कोई घटा के देख

अज़हर लखनवी

तू भी वफ़ा के रूप में अब ढल के देख ले

अज़हर जावेद

इस बुलंदी पे कहाँ थे पहले

अज़हर इनायती

भँवर से ये जो मुझे बादबान खींचता है

अज़हर फ़राग़

भँवर से ये जो मुझे बादबान खींचता है

अज़हर फ़राग़

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