मांग Poetry (page 24)
जब तिरे ख़्वाब से बेदार हुआ करते थे
अज़हर अब्बास
कुछ भी हो मिरा हाल नुमायाँ तो नहीं है
अज़ीम मुर्तज़ा
फ़ुग़ाँ से तर्क-ए-फ़ुग़ाँ तक हज़ार तिश्ना-लबी है
अज़ीम मुर्तज़ा
अफ़्साना-ए-हयात-ए-परेशाँ के साथ साथ
अज़ीम मुर्तज़ा
हर इक शिकस्त को ऐ काश इस तरह मैं सहूँ
आज़ाद गुलाटी
दीदार की तलब के तरीक़ों से बे-ख़बर
आज़ाद अंसारी
उश्शाक़ बहुत हैं तिरे बीमार बहुत हैं
अय्यूब ख़ावर
ये राह-ए-तलब यारो गुमराह भी करती है
अतीक़ुल्लाह
मुझ से बे-ज़ारो न यूँ संग से मारो मुझ को
अतीक़ुल्लाह
मिरे सुपुर्द कहाँ वो ख़ज़ाना करता था
अतीक़ुल्लाह
इस दश्त नवर्दी में जीना बहुत आसाँ था
अतीक़ुल्लाह
चराग़ हाथों के बुझ रहे हैं सितारा हर रह-गुज़र में रख दे
अतीक़ुल्लाह
जीना है तो जीने का सहारा भी तो होगा
अतहर राज़
लम्हों के अज़ाब सह रहा हूँ
अतहर नफ़ीस
वो क्या तलब थी तिरे जिस्म के उजाले की
अता शाद
गहरी है शब की आँच कि ज़ंजीर-ए-दर कटे
अता शाद
दिलों के दर्द जगा ख़्वाहिशों के ख़्वाब सजा
अता शाद
तआरुफ़
असरार-उल-हक़ मजाज़
तक़द्दुस-ए-मआब
असरार जामई
मैं सच तो कह दूँ पर उस को कहीं बुरा न लगे
असरा रिज़वी
जाने किस लम्हा-ए-वहशी की तलब है कि फ़लक
असलम कोलसरी
यार को दीदा-ए-ख़ूँ-बार से ओझल कर के
असलम कोलसरी
जगमगाती ख़्वाहिशों का नूर फैला रात भर
असलम आज़ाद
बस एक बार उसे रौशनी में देखा था
असलम आज़ाद
इक बर्ग बर्ग दिन की ख़बर चाहिए मुझे
असलम अंसारी
बुझी है आतिश-ए-रंग-ए-बहार आहिस्ता आहिस्ता
असलम अंसारी
ये सोचा ही नहीं था तिश्नगी में
आसिमा ताहिर
मिस्र फ़िरऔन की तहवील में आया हुआ है
आसिम वास्ती
कहाँ तलाश में जाऊँ कि जुस्तुजू तू है
आसिम वास्ती
एक यूसुफ़ के ख़रीदार हुए हैं हम लोग
अासिफ़ शफ़ी
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