वफ़ा Poetry (page 58)

कम जो ठहरे जफ़ा से मेरी वफ़ा

आरज़ू लखनवी

जो दिल रखते हैं सीने में वो काफ़िर हो नहीं सकते

आरज़ू लखनवी

हमारी नाकामी-ए-वफ़ा ने ज़माने की खोल दी हैं आँखें

आरज़ू लखनवी

है मोहब्बत ऐसी बंधी गिरह जो न एक हाथ से खुल सके

आरज़ू लखनवी

दोस्त ने दिल को तोड़ के नक़्श-ए-वफ़ा मिटा दिया

आरज़ू लखनवी

यही इक निबाह की शक्ल है वो जफ़ा करें मैं वफ़ा करूँ

आरज़ू लखनवी

फेर जो पड़ना था क़िस्मत में वो हस्ब-ए-मामूल पड़ा

आरज़ू लखनवी

मीर-ए-महफ़िल न हुए गर्मी-ए-महफ़िल तो हुए

आरज़ू लखनवी

मिरी निगाह कहाँ दीद-ए-हुस्न-ए-यार कहाँ

आरज़ू लखनवी

मासूम नज़र का भोला-पन ललचा के लुभाना क्या जाने

आरज़ू लखनवी

क्यूँ किसी रह-रौ से पूछूँ अपनी मंज़िल का पता

आरज़ू लखनवी

किसी गुमान-ओ-यक़ीं की हद में वो शोख़-ए-पर्दा-नशीं नहीं है

आरज़ू लखनवी

ख़ाली बैठे क्यूँ दिन काटें आओ रे जी इक काम करें

आरज़ू लखनवी

जिन रातों में नींद उड़ जाती है क्या क़हर की रातें होती हैं

आरज़ू लखनवी

जहाँ कि है जुर्म एक निगाह करना

आरज़ू लखनवी

दिल मुकद्दर है आईना-रू का

आरज़ू लखनवी

ऐ मिरे ज़ख़्म-ए-दिल-नवाज़ ग़म को ख़ुशी बनाए जा

आरज़ू लखनवी

आने में झिझक मिलने में हया तुम और कहीं हम और कहीं

आरज़ू लखनवी

माँगने से क़ज़ा नहीं मिलती

अरुण कुमार आर्य

यक़ीन-ए-सुब्ह-ए-चमन है कितना शुऊर-ए-अब्र-ए-बहार क्या है

अर्शी भोपाली

तमाम हुस्न-ए-जहाँ का जवाब हो के रहा

अर्शी भोपाली

रक़्स-ए-आशुफ़्ता-सरी की कोई तदबीर सही

अर्शी भोपाली

निगाह-ए-शौक़ से कब तक मुक़ाबला करते

अर्शी भोपाली

निगाह तेज़ शुऊ'र-ए-बुलंद रखते हैं

अर्शी भोपाली

मुख़ालिफ़ों के जिलौ में वो आज शामिल था

अरशदुल क़ादरी

क़ल्ब-ओ-नज़र का सुकूँ और कहाँ दोस्तो

अरशद सिद्दीक़ी

किसी सूरत अगर इज़हार की सूरत निकल आए

अरशद लतीफ़

रक़म करूँ भी तो कैसे मैं दास्तान-ए-वफ़ा

अरशद जमाल 'सारिम'

जुड़े हुए हैं परी-ख़ाने मेरे काग़ज़ से

अरशद जमाल 'सारिम'

बे-अमाँ हूँ इन दिनों मैं दर-ब-दर फिरता हूँ मैं

अरशद जमाल 'सारिम'

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