वहशत Poetry (page 14)

सिर्फ़ आज़ार उठाने से कहाँ बनता है

इलियास बाबर आवान

पहनाई

इज्तिबा रिज़वी

इस क़दर भी तो न जज़्बात पे क़ाबू रक्खो

इफ़्तिख़ार नसीम

समुंदर के किनारे एक बस्ती रो रही है

इफ़्तिख़ार आरिफ़

घर की वहशत से लरज़ता हूँ मगर जाने क्यूँ

इफ़्तिख़ार आरिफ़

अज़ाब-ए-वहशत-ए-जाँ का सिला न माँगे कोई

इफ़्तिख़ार आरिफ़

एक ख़्वाब की दूरी पर

इफ़्तिख़ार आरिफ़

आख़िरी आदमी का रजज़

इफ़्तिख़ार आरिफ़

तार-ए-शबनम की तरह सूरत-ए-ख़स टूटती है

इफ़्तिख़ार आरिफ़

ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है

इफ़्तिख़ार आरिफ़

फ़ज़ा में वहशत-ए-संग-ओ-सिनाँ के होते हुए

इफ़्तिख़ार आरिफ़

अज़ाब-ए-वहशत-ए-जाँ का सिला न माँगे कोई

इफ़्तिख़ार आरिफ़

इस से पहले कि ज़मीं-ज़ाद शरारत कर जाएँ

इदरीस बाबर

इस से पहले कि ज़मीं-ज़ाद शरारत कर जाएँ

इदरीस बाबर

और वहशत है इरादा मेरा

इदरीस बाबर

बे तेरे क्या वहशत हम को तुझ बिन कैसा सब्र ओ सुकूँ

इब्न-ए-इंशा

ये बातें झूटी बातें हैं

इब्न-ए-इंशा

फिर शाम हुई

इब्न-ए-इंशा

लब पर नाम किसी का भी हो

इब्न-ए-इंशा

इस बस्ती के इक कूचे में

इब्न-ए-इंशा

चाँद के तमन्नाई

इब्न-ए-इंशा

उस शाम वो रुख़्सत का समाँ याद रहेगा

इब्न-ए-इंशा

सुनते हैं फिर छुप छुप उन के घर में आते जाते हो

इब्न-ए-इंशा

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा

इब्न-ए-इंशा

हमें तुम पे गुमान-ए-वहशत था हम लोगों को रुस्वा किया तुम ने

इब्न-ए-इंशा

वक़्त ने रंग बहुत बदले क्या कुछ सैलाब नहीं आए

हिलाल फ़रीद

कभी तो सेहन-ए-अना से निकले कहीं पे दश्त-ए-मलाल आया

हिलाल फ़रीद

न होती हाल-ए-दिल कहने की गर हिम्मत तो अच्छा था

हया लखनवी

गुज़रा अपना पस-ए-मुर्दन ही सही

हातिम अली मेहर

ग़ैर हँसते हैं फ़क़त इस लिए टल जाता हूँ

हातिम अली मेहर

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