Love Poetry (page 166)
शब की तारीकी बढ़ती ही जाए
दीद राही
दिल से जब लौ लगी नहीं होती
दीद राही
ज़ीस्त बे-वादा-ए-अनवार-ए-सहर है कि जो थी
द्वारका दास शोला
ज़िंदगी क्या है इब्तिला के सिवा
द्वारका दास शोला
ज़रा निगाह उठाओ कि ग़म की रात कटे
द्वारका दास शोला
नहीं कहते किसी से हाल-ए-दिल ख़ामोश रहते हैं
द्वारका दास शोला
मेरी मंज़िल कहाँ है क्या मा'लूम
द्वारका दास शोला
मिरी बे-क़रारी मिरी आह-ओ-ज़ारी ये वहशत नहीं है तो फिर और क्या है
द्वारका दास शोला
इश्क़ में आबरू ख़राब हुई
द्वारका दास शोला
ग़म को वज्ह-ए-हयात कहते हैं
द्वारका दास शोला
एक रहज़न को अमीर-ए-कारवाँ समझा था मैं
द्वारका दास शोला
देख जुर्म-ओ-सज़ा की बात न कर
द्वारका दास शोला
अपनों के सितम याद न ग़ैरों की जफ़ा याद
द्वारका दास शोला
अपनी बेचारगी पे रो न सके
द्वारका दास शोला
विर्सा
दाऊद ग़ाज़ी
वक़्त की सदियाँ
दाऊद ग़ाज़ी
सौग़ात
दाऊद ग़ाज़ी
रात
दाऊद ग़ाज़ी
मुलाक़ात
दाऊद ग़ाज़ी
मज़दूर
दाऊद ग़ाज़ी
जवाज़
दाऊद ग़ाज़ी
इल्म
दाऊद ग़ाज़ी
हर किताब-ए-सोहबत-ए-रंगीं के मअ'नी देख कर
दाऊद औरंगाबादी
दिया उस ख़ुश-नयन ने रात कूँ मुझ कूँ सुराग़ अपना
दाऊद औरंगाबादी
तेरी अँखियाँ के तसव्वुर में सदा मस्ताना हूँ
दाऊद औरंगाबादी
निगाह-ए-यार सूँ हासिल है मुझ कूँ मय-नोशी
दाऊद औरंगाबादी
मुझ साथ सैर-ए-बाग़ कूँ ऐ नौ-बहार चल
दाऊद औरंगाबादी
मिरा अहवाल चश्म-ए-यार सूँ पूछ
दाऊद औरंगाबादी
मस्त हूँ मस्त हूँ ख़राब ख़राब
दाऊद औरंगाबादी
ले दाम-ए-निगाह-ए-यार आया
दाऊद औरंगाबादी