Love Poetry (page 59)

ज़िंदगी अब रहे ख़ता कब तक

हरी मेहता

ग़म-ज़दा ज़िंदगी रही न रही

हरी मेहता

शबाब आया किसी बुत पर फ़िदा होने का वक़्त आया

हरी चंद अख़्तर

जिन्हें हासिल है तेरा क़ुर्ब ख़ुश-क़िस्मत सही लेकिन

हरी चंद अख़्तर

जम्अ हैं सारे मुसाफ़िर ना-ख़ुदा-ए-दिल के पास

हरी चंद अख़्तर

हाँ वो दिन याद हैं जब हम भी कहा करते थे

हरी चंद अख़्तर

अगर तेरी ख़ुशी है तेरे बंदों की मसर्रत में

हरी चंद अख़्तर

उमीदों से दिल-ए-बर्बाद को आबाद करता हूँ

हरी चंद अख़्तर

शैख़ ओ पंडित धर्म और इस्लाम की बातें करें

हरी चंद अख़्तर

शबाब आया किसी बुत पर फ़िदा होने का वक़्त आया

हरी चंद अख़्तर

सैर-ए-दुनिया से ग़रज़ थी महव-ए-दुनिया कर दिया

हरी चंद अख़्तर

कलियों का तबस्सुम हो, कि तुम हो कि सबा हो

हरी चंद अख़्तर

जिस ज़मीं पर तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा होता है

हरी चंद अख़्तर

जम्अ हैं सारे मुसाफ़िर ना-ख़ुदा-ए-दिल के पास

हरी चंद अख़्तर

जहाँ तुझ को बिठा कर पूजते हैं पूजने वाले

हरी चंद अख़्तर

ग़ुरूर-ज़ब्त से आह-ओ-फ़ुग़ाँ तक बात आ पहुँची

हरी चंद अख़्तर

गधों का चैलन्ज

हरफ़न लखनवी

तेरे हुस्न की ख़ैर बना दे इक दिन का सुल्तान मुझे

हरबंस तसव्वुर

मंज़र दे बीनाई दे

हरबंस तसव्वुर

ये क्या ख़बर थी कि जब तुम से दोस्ती होगी

हरबंस लाल अनेजा 'जमाल'

वो पेच-ओ-ख़म जहाँ की हर इक रहगुज़र में है

हरबंस लाल अनेजा 'जमाल'

वो मद प्याले लुंढाते ही रहे बस

हरबंस लाल अनेजा 'जमाल'

तुम आए जब नहीं नाकाम लौट जाने को

हरबंस लाल अनेजा 'जमाल'

कौन है जो न हुआ बंदिश-ए-ग़म से आज़ाद

हरबंस लाल अनेजा 'जमाल'

अश्कों का मिरी आँख से पैग़ाम न आए

हरबंस लाल अनेजा 'जमाल'

तख़लीक़-ए-बे-सबात का ज़र्रा-नज़ीर हूँ

हक़ीर जहानी

सैद को रश्क-ए-चमन दाम ने रहने न दिया

हक़ीर जहानी

अब किस की जुस्तुजू हो तिरी जुस्तुजू के बा'द

हक़ीर जहानी

यक-ब-यक तर्क न करना था मोहब्बत मुझ से

हक़ीर

टूटें वो सर जिस में तेरी ज़ुल्फ़ का सौदा नहीं

हक़ीर