दिल Poetry (page 142)

तू ने पूछा है मिरे दोस्त!

साइमा असमा

मयस्सर ख़ुद निगह-दारी की आसाइश नहीं रहती

साइमा असमा

कुछ बे-नाम तअल्लुक़ जिन को नाम अच्छा सा देने में

साइमा असमा

कोई इम्काँ तो न था उस का मगर चाहता था

साइमा असमा

मुख़्तसर वक़्त है पर बातें कर

साइम जी

कभी ज़ुहूर में आ जा कमाल होने दे

साइम जी

दयार-ए-दिल से किसी का गुज़र ज़रूरी था

साइम जी

आँखों को ख़्वाब-नाक बनाना पड़ा मुझे

साइम जी

तुम्हारे ब'अद ख़ुदा जाने क्या हुआ दिल को

सैफ़ुद्दीन सैफ़

रात गुज़रे न दर्द-ए-दिल ठहरे

सैफ़ुद्दीन सैफ़

क्यूँ उजड़ जाती है दिल की महफ़िल

सैफ़ुद्दीन सैफ़

कोई ऐसा अहल-ए-दिल हो कि फ़साना-ए-मोहब्बत

सैफ़ुद्दीन सैफ़

कैसे जीते हैं ये किस तरह जिए जाते हैं

सैफ़ुद्दीन सैफ़

कभी जिगर पे कभी दिल पे चोट पड़ती है

सैफ़ुद्दीन सैफ़

ऐसे लम्हे भी गुज़ारे हैं तिरी फ़ुर्क़त में

सैफ़ुद्दीन सैफ़

ज़ोहद किस किस ने लुटाए हैं तुम्हें क्या मालूम

सैफ़ुद्दीन सैफ़

तिरी नज़र से ज़माने बदलते रहते हैं

सैफ़ुद्दीन सैफ़

सुब्ह से शाम के आसार नज़र आने लगे

सैफ़ुद्दीन सैफ़

रुख़ पे यूँ झूम कर वो लट जाए

सैफ़ुद्दीन सैफ़

क़ज़ा का वक़्त रुख़्सत की घड़ी है

सैफ़ुद्दीन सैफ़

क़रीब मौत खड़ी है ज़रा ठहर जाओ

सैफ़ुद्दीन सैफ़

फैल रहे हैं वक़्त के साए

सैफ़ुद्दीन सैफ़

मिरी दास्तान-ए-हसरत वो सुना सुना के रोए

सैफ़ुद्दीन सैफ़

मग़रूर थे अपनी ज़ात पर हम

सैफ़ुद्दीन सैफ़

लुत्फ़ फ़रमा सको तो आ जाओ

सैफ़ुद्दीन सैफ़

क्यूँ उजड़ जाती है दिल की महफ़िल

सैफ़ुद्दीन सैफ़

कुछ तो रंगीनी-ए-अफ़कार खुले

सैफ़ुद्दीन सैफ़

कोई नहीं आता समझाने

सैफ़ुद्दीन सैफ़

खोया पाने वालों ने

सैफ़ुद्दीन सैफ़

जब वज्ह-ए-सुकून-ए-जाँ ठहर जाए

सैफ़ुद्दीन सैफ़

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