दिल Poetry (page 302)

अहद-नामा-ए-इमराेज़

अज़ीज़ क़ैसी

आईने से

अज़ीज़ क़ैसी

वालिहाना मिरे दिल में मिरी जाँ में आ जा

अज़ीज़ क़ैसी

उन्हें सवाल ही लगता है मेरा रोना भी

अज़ीज़ क़ैसी

उलझाओ का मज़ा भी तिरी बात ही में था

अज़ीज़ क़ैसी

तमीज़ अपने में ग़ैर में क्या तुम्हें जो अपना न कर सके हम

अज़ीज़ क़ैसी

पस-ए-तर्क-ए-इश्क़ भी उम्र-भर तरफ़-ए-मिज़ा पे तरी रही

अज़ीज़ क़ैसी

मिटा के अंजुमन-ए-आरज़ू सदा दी है

अज़ीज़ क़ैसी

हर आँख लहू सागर है मियाँ हर दिल पत्थर सन्नाटा है

अज़ीज़ क़ैसी

मैं नींद के ऐवान में हैरान था कल शब

अज़ीज़ नबील

कुछ देर तो दुनिया मिरे पहलू में खड़ी थी

अज़ीज़ नबील

जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच जाऊँ मसाफ़त कैसी

अज़ीज़ नबील

इस बार हवाओं ने जो बेदाद-गरी की

अज़ीज़ नबील

हयात-ओ-काएनात पर किताब लिख रहे थे हम

अज़ीज़ नबील

अगरचे ज़ेहन के कश्कोल से छलक रहे थे

अज़ीज़ नबील

ज़बान दिल की हक़ीक़त को क्या बयाँ करती

अज़ीज़ लखनवी

वही हिकायत-ए-दिल थी वही शिकायत-ए-दिल

अज़ीज़ लखनवी

तिरी कोशिश हम ऐ दिल सई-ए-ला-हासिल समझते हैं

अज़ीज़ लखनवी

सुकून-ए-दिल नहीं जिस वक़्त से उस बज़्म में आए

अज़ीज़ लखनवी

शीशा-ए-दिल को यूँ न उठाओ

अज़ीज़ लखनवी

शम्अ' बुझ कर रह गई परवाना जल कर रह गया

अज़ीज़ लखनवी

माना कि बज़्म-ए-हुस्न के आदाब हैं बहुत

अज़ीज़ लखनवी

कभी जन्नत कभी दोज़ख़ कभी का'बा कभी दैर

अज़ीज़ लखनवी

आप जिस दिल से गुरेज़ाँ थे उसी दिल से मिले

अज़ीज़ लखनवी

'मीर'

अज़ीज़ लखनवी

लज़्ज़त-ए-ग़म

अज़ीज़ लखनवी

आतिश-ए-ख़ामोश

अज़ीज़ लखनवी

ये मशवरा बहम उठ्ठे हैं चारा-जू करते

अज़ीज़ लखनवी

ये ग़लत है ऐ दिल-ए-बद-गुमाँ कि वहाँ किसी का गुज़र नहीं

अज़ीज़ लखनवी

वो निगाहें क्या कहूँ क्यूँ कर रग-ए-जाँ हो गईं

अज़ीज़ लखनवी

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