गुल Poetry (page 38)

घर की रौनक़

रज़ा नक़वी वाही

यूँही ज़ालिम का रहा राज अगर अब के बरस

रज़ा मौरान्वी

ये किस दयार के हैं किस के ख़ानदान से हैं

रज़ा मौरान्वी

क्या पूछते हो मुझ को मोहब्बत में क्या मिला

रज़ा जौनपुरी

कैफ़ नसीब अब कहाँ ग़ुंचों के भी जमाल में

रज़ा जौनपुरी

झुक सके आप का ये सर तो झुका कर देखें

रज़ा जौनपुरी

बिखर गया हूँ फ़ज़ाओं में बू-ए-गुल की तरह

रज़ा हमदानी

जुनूँ का राज़ मोहब्बत का भेद पा न सकी

रज़ा हमदानी

ज़ुल्फ़ खोले था कहाँ अपनी वो फिर बेबाक रात

रज़ा अज़ीमाबादी

यार के रुख़ ने कभी इतना न हैराँ किया

रज़ा अज़ीमाबादी

मुझ को जो कहते हो म्याँ तुम हो कहाँ तुम हो कहाँ

रज़ा अज़ीमाबादी

मेरे नाले पर नहीं तुझ को तग़ाफ़ुल के सिवा

रज़ा अज़ीमाबादी

हर नफ़स मूरिद-ए-सफ़र हैं हम

रज़ा अज़ीमाबादी

अब्र के बिन देखे हरगिज़ ख़ुश दिल-ए-मस्ताँ न हो

रज़ा अज़ीमाबादी

पचास सालों में दो इक बरस का रिश्ता था

रज़ा अश्क

दिल बता और क्या है होने को

रज़ा अमरोही

वो निकहत-ए-गेसू फिर ऐ हम-नफ़साँ आई

रविश सिद्दीक़ी

वो बर्क़-ए-नाज़ गुरेज़ाँ नहीं तो कुछ भी नहीं

रविश सिद्दीक़ी

उस से बढ़ कर तो कोई बे-सर-ओ-सामाँ न मिला

रविश सिद्दीक़ी

रंग पर जब वो बज़्म-ए-नाज़ आई

रविश सिद्दीक़ी

रब्त-ए-पिन्हाँ की सदाक़त है न मिलना तेरा

रविश सिद्दीक़ी

क्या सितम कर गई ऐ दोस्त तिरी चश्म-ए-करम

रविश सिद्दीक़ी

ख़ल्वती-ए-ख़याल को होश में कोई लाए क्यूँ

रविश सिद्दीक़ी

फ़रोग़-ए-गुल से अलग बर्क़-ए-आशियाँ से अलग

रविश सिद्दीक़ी

दौर-ए-सबूही शोला-ए-मीना रक़्साँ छाँव में तारों की

रविश सिद्दीक़ी

बादा-ए-गुल को सब अंदोह-रुबा कहते हैं

रविश सिद्दीक़ी

उड़ जाऊँगा बहार में मानिंद-ए-बू-ए-गुल

रौनक़ टोंकवी

न बातें कीं न तस्कीं दी न पहलू में ज़रा ठहरे

रौनक़ टोंकवी

दिल तक हो चाक तेग़ जो सर पर लगाइए

रौनक़ टोंकवी

मुझ को मत छूना कि रिस कर फूटने वाला हूँ मैं

रौनक़ रज़ा

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