हुआ Poetry (page 220)

किस तवक़्क़ो' पे क्या उठा रखिए

अहमद हमेश

किस का शोअ'ला जल रहा है शो'लगी से मावरा

अहमद हमेश

कभी तुम ने कुछ तो दिया नहीं कभी हम ने कुछ तो लिया नहीं

अहमद हमेश

नित-नए रंग से करता रहा दिल को पामाल

अहमद हमदानी

नहीं मिलते वो अब तो क्या बात है

अहमद हमदानी

लम्हा लम्हा कह रही हैं कुछ फ़ज़ाएँ आग की

अहमद हमदानी

ज़िंदगी! तुझ सा मुनाफ़िक़ भी कोई क्या होगा

अहमद फ़रीद

ज़ख़्म गिनता हूँ शब-ए-हिज्र में और सोचता हूँ

अहमद फ़रीद

सामने फिर मिरे अपने हैं सो मैं जानता हूँ

अहमद फ़रीद

जब से इक चाँद की चाहत में सितारा हुआ हूँ

अहमद फ़रीद

दिन से बिछड़ी हुई बारात लिए फिरती है

अहमद फ़रीद

उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ

अहमद फ़राज़

लो फिर तिरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र

अहमद फ़राज़

कौन ताक़ों पे रहा कौन सर-ए-राहगुज़र

अहमद फ़राज़

हुजूम ऐसा कि राहें नज़र नहीं आतीं

अहमद फ़राज़

चले थे यार बड़े ज़ोम में हवा की तरह

अहमद फ़राज़

मत क़त्ल करो आवाज़ों को

अहमद फ़राज़

मैं और तू

अहमद फ़राज़

ख़्वाबों के ब्योपारी

अहमद फ़राज़

कर गए कूच कहाँ

अहमद फ़राज़

काली दीवार

अहमद फ़राज़

हच-हाईकर

अहमद फ़राज़

दोस्ती का हाथ

अहमद फ़राज़

भली सी एक शक्ल थी

अहमद फ़राज़

बन-बास की एक शाम

अहमद फ़राज़

ऐ मेरे वतन के ख़ुश-नवाओ

अहमद फ़राज़

ऐ मेरे सारे लोगो

अहमद फ़राज़

अभी हम ख़ूबसूरत हैं

अहमद फ़राज़

ये शहर सेहर-ज़दा है सदा किसी की नहीं

अहमद फ़राज़

उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ

अहमद फ़राज़

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