हुआ Poetry (page 222)

मैं तेरी रूह में उतरा हुआ मिलूँगा तुझे

अहमद अता

सफ़्हा-ए-ज़ीस्त जब पढूँगा तुम्हें

अहमद अता

मैं न होने से हुआ या'नी बड़ी तक़्सीर की

अहमद अता

ख़्वाब का इज़्न था ता'बीर-ए-इजाज़त थी मुझे

अहमद अता

इक अश्क बहा होगा

अहमद अता

ये अलग बात कि तज्दीद-ए-तअल्लुक़ न हुआ

अहमद अशफ़ाक़

जितनी हम चाहते थे उतनी मोहब्बत नहीं दी

अहमद अशफ़ाक़

हम तिरे इश्क़ में कुछ ऐसे ठिकाने लग जाएँ

अहमद अशफ़ाक़

गए दिनों की रक़ाबत को वो भुला न सके

अहमद अशफ़ाक़

अना मुँह आँसुओं से धो रही है

अहमद अशफ़ाक़

मैं सोज़-ए-दरूँ अपना दिखा भी नहीं सकता

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

आवाज़ का उस की ज़ेर-ओ-बम कुछ याद रहा कुछ भूल गए

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

उसे सुलझाऊँ कैसे

आग़ाज़ बरनी

मैं हर्फ़-ए-इब्तिदा हूँ

आग़ाज़ बरनी

घर से निकलना जब मिरी तक़दीर हो गया

आग़ाज़ बरनी

नर्म रेशम सी मुलाएम किसी मख़मल की तरह

आग़ाज़ बलडांवी

रोने से जो भड़ास थी दिल की निकल गई

आग़ा शाएर क़ज़लबाश

मुझ को आता है तयम्मुम न वज़ू आता है

आग़ा शाएर क़ज़लबाश

दिल सर्द हो गया है तबीअत बुझी हुई

आग़ा शाएर क़ज़लबाश

ख़ल्वत-सरा-ए-यार में पहुँचेगा क्या कोई

आग़ा हज्जू शरफ़

दो वक़्त निकलने लगी लैला की सवारी

आग़ा हज्जू शरफ़

उड़ कर सुराग़-ए-कूचा-ए-दिलबर लगाइए

आग़ा हज्जू शरफ़

तीर-ए-नज़र से छिद के दिल-अफ़गार ही रहा

आग़ा हज्जू शरफ़

तिरी हवस में जो दिल से पूछा निकल के घर से किधर को चलिए

आग़ा हज्जू शरफ़

तिरे वास्ते जान पे खेलेंगे हम ये समाई है दिल में ख़ुदा की क़सम

आग़ा हज्जू शरफ़

सलफ़ से लोग उन पे मर रहे हैं हमेशा जानें लिया करेंगे

आग़ा हज्जू शरफ़

रुलवा के मुझ को यार गुनहगार कर नहीं

आग़ा हज्जू शरफ़

रहा करते हैं यूँ उश्शाक़ तेरी याद ओ हसरत में

आग़ा हज्जू शरफ़

पाया तिरे कुश्तों ने जो मैदान-ए-बयाबाँ

आग़ा हज्जू शरफ़

नाहक़ ओ हक़ का उन्हें ख़ौफ़-ओ-ख़तर कुछ भी नहीं

आग़ा हज्जू शरफ़

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