जान Poetry (page 60)

बाहम जो हुस्न ओ इश्क़ में याराना हो गया

अहसन मारहरवी

ऐ दिल न सुन अफ़्साना किसी शोख़ हसीं का

अहसन मारहरवी

ज़हर को मय न कहूँ मय को गवारा न कहूँ

अहमद ज़फ़र

इस माअ'रके में इश्क़ बेचारा करेगा क्या

अहमद मुश्ताक़

लाग़र हैं जिस्म रंग हैं काले पड़े हुए

अहमद मुश्ताक़

किस रक़्स-ए-जान-आे-तन में मिरा दिल नहीं रहा

अहमद मुश्ताक़

कहाँ की गूँज दिल-ए-ना-तवाँ में रहती है

अहमद मुश्ताक़

इन मौसमों में नाचते गाते रहेंगे हम

अहमद मुश्ताक़

किसी से क्या कहें सुनें अगर ग़ुबार हो गए

अहमद महफ़ूज़

तू जो ये जान हथेली पे लिए फिरता है

अहमद ख़याल

शहर-ए-सदमात से आगे नहीं जाने वाला

अहमद ख़याल

जो तिरे ग़म की गिरानी से निकल सकता है

अहमद ख़याल

बस्ती से चंद रोज़ किनारा करूँगा मैं

अहमद ख़याल

मगर वो दिया ही नहीं मान कर के

अहमद जावेद

गए थे वहाँ जी में क्या ठान कर के

अहमद जावेद

दुनिया से तन को ढाँप क़यामत से जान को

अहमद जावेद

गर बस चले तो आप फिरूँ अपने गर्द मैं

अहमद हुसैन माइल

वो बुत परी है निकालें न बाल-ओ-पर ता'वीज़

अहमद हुसैन माइल

समझ के हूर बड़े नाज़ से लगाई चोट

अहमद हुसैन माइल

रू-ए-ताबाँ माँग मू-ए-सर धुआँ बत्ती चराग़

अहमद हुसैन माइल

क़िबला-ए-आब-ओ-गिल तुम्हीं तो हो

अहमद हुसैन माइल

निकली जो रूह हो गए अजज़ा-ए-तन ख़राब

अहमद हुसैन माइल

जुम्बिश में ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

अहमद हुसैन माइल

हो गए मुज़्तर देखते ही वो हिलती ज़ुल्फ़ें फिरती नज़र हम

अहमद हुसैन माइल

चोरी से दो घड़ी जो नज़ारे हुए तो क्या

अहमद हुसैन माइल

मुकाशफ़ा-2

अहमद हमेश

दर-अस्ल ये नज़्म लिखी ही नहीं गई

अहमद हमेश

जब से मैं ख़ुद को खो रहा हूँ

अहमद हमेश

उम्र भर कौन निभाता है तअल्लुक़ इतना

अहमद फ़राज़

कितना आसाँ था तिरे हिज्र में मरना जानाँ

अहमद फ़राज़

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