जाम Poetry (page 25)

अल्लाह-रे फ़ैज़ एक जहाँ मुस्तफ़ीद है

बेदम शाह वारसी

लहू टपका किसी की आरज़ू से

बयान मेरठी

खुला है जल्वा-ए-पिन्हाँ से अज़-बस चाक वहशत का

बयान मेरठी

ख़ाक करती है ब-रंग-ए-चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम रक़्स

बयान मेरठी

कर लिया दिन में काम आठ से पाँच

बासिर सुल्तान काज़मी

अब के जुनूँ में लज़्ज़त-ए-आज़ार भी नहीं

बशीर फ़ारूक़ी

प्यार ही प्यार है सब लोग बराबर हैं यहाँ

बशीर बद्र

मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा

बशीर बद्र

कभी तो आसमाँ से चाँद उतरे जाम हो जाए

बशीर बद्र

हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका

बशीर बद्र

वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है

बशीर बद्र

मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा

बशीर बद्र

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में

बशीर बद्र

जब तक निगार-ए-दाश्त का सीना दुखा न था

बशीर बद्र

हमारे पास तो आओ बड़ा अंधेरा है

बशीर बद्र

हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए

बशीर बद्र

फ़लक से चाँद सितारों से जाम लेना है

बशीर बद्र

मुझे कहना है

बशर नवाज़

जब अयाँ सुब्ह को वो नूर-ए-मुजस्सम हो जाए

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

रखता है यूँ वो ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम दोश पर

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

मुझे तो इश्क़ में अब ऐश-ओ-ग़म बराबर है

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

चश्म-ए-तर जाम दिल-ए-बादा-कशाँ है शीशा

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

उस ने कहा!

बाक़र मेहदी

सादा काग़ज़ पे कोई नाम कभी लिख लेना!

बाक़र मेहदी

लोग भूके हैं बहुत और निवाले कम हैं

बलवान सिंह आज़र

तहलील

बलराज कोमल

रुख़ जो ज़ेर-ए-सुंबल-ए-पुर-पेच-ओ-ताब आ जाएगा

ज़फ़र

न दाइम ग़म है ने इशरत कभी यूँ है कभी वूँ है

ज़फ़र

मोहब्बत चाहिए बाहम हमें भी हो तुम्हें भी हो

ज़फ़र

करेंगे क़स्द हम जिस दम तुम्हारे घर में आवेंगे

ज़फ़र

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