जंगल Poetry (page 11)

अजीब तजरबा आँखों को होने वाला था

फ़रहत एहसास

शौक़ आसूदा-ए-तहलील-ए-मुअम्मा न हुआ

फ़रहान सालिम

मुद्दतों हम से मुलाक़ात नहीं करते हैं

फ़रह इक़बाल

कहीं यक़ीं से न हो जाएँ हम गुमाँ की तरह

फ़रह इक़बाल

कभी तुम भीगने आना मिरी आँखों के मौसम में

फ़रह इक़बाल

दर्द का समुंदर है सिर्फ़ पार होने तक

फ़रह इक़बाल

जहाँ फ़ैज़ान-ए-आबादी बहुत है

फ़ैज़ान आरिफ़

दुआओं के दिए जब जल रहे थे

फ़ैज़ान आरिफ़

अदावतों में जो ख़ल्क़-ए-ख़ुदा लगी हुई है

फ़ैसल अजमी

मुझे कौन बुलाता रहता है

फ़हीम शनास काज़मी

अली-बाबा कोई सिम-सिम

फ़हीम शनास काज़मी

जान-ए-अय्याम-ए-दिलबरी है याद

फ़ाएज़ देहलवी

था वो जंगल कि नगर याद नहीं

एजाज़ उबैद

तकमील

एजाज़ फ़ारूक़ी

तन्हाई का रोग न पाल

एजाज़ तालिब

हुस्न की रीतें इश्क़ की रस्में छोटे बच्चे क्या जानें

एजाज़ अहमद एजाज़

गया था बज़्म-ए-मोहब्बत में ख़ाली जाम लिए

एहतिशाम हुसैन

देखना ये है कि जंगल को चलाने के लिए

दानियाल तरीर

दरिंदे साथ रहना चाहते हैं आदमी के

दानियाल तरीर

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दानियाल तरीर

रंग और नूर की तमसील से होगा कि नहीं

दानियाल तरीर

जरस और सारबानों तक पहुँचना चाहता है

दानियाल तरीर

बदन को अपनी बिसात तक तो पसारना था

चंद्र प्रकाश शाद

हम से यूँ बे-रुख़ी से मिलते हैं

चमन लाल चमन

हमारा वतन दिल से प्यारा वतन

चकबस्त ब्रिज नारायण

अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता

चकबस्त ब्रिज नारायण

ये शहर-ए-ना-रसाई है

बुशरा एजाज़

आसमाँ है समुंदर पे छाया हुआ

बृजेश अम्बर

सब ने होंटों से लगा कर तोड़ डाला है मुझे

भारत भूषण पन्त

वो सूरत गर्द-ए-ग़म में छुप गई हो

बशीर बद्र

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