साथ Poetry (page 90)

ये मैं भी क्या हूँ उसे भूल कर उसी का रहा

अहमद फ़राज़

ये आलम शौक़ का देखा न जाए

अहमद फ़राज़

वहशतें बढ़ती गईं हिज्र के आज़ार के साथ

अहमद फ़राज़

तिरा क़ुर्ब था कि फ़िराक़ था वही तेरी जल्वागरी रही

अहमद फ़राज़

सू-ए-फ़लक न जानिब-ए-महताब देखना

अहमद फ़राज़

नज़र बुझी तो करिश्मे भी रोज़-ओ-शब के गए

अहमद फ़राज़

क्यूँ न हम अहद-ए-रिफ़ाक़त को भुलाने लग जाएँ

अहमद फ़राज़

कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो

अहमद फ़राज़

कल हम ने बज़्म-ए-यार में क्या क्या शराब पी

अहमद फ़राज़

जो ग़ैर थे वो इसी बात पर हमारे हुए

अहमद फ़राज़

हर एक बात न क्यूँ ज़हर सी हमारी लगे

अहमद फ़राज़

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला

अहमद फ़राज़

बैठे थे लोग पहलू-ब-पहलू पिए हुए

अहमद फ़राज़

अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं

अहमद फ़राज़

अब शौक़ से कि जाँ से गुज़र जाना चाहिए

अहमद फ़राज़

बाज़ार की फ़सील भी रुख़्सार पर मले

अहमद अज़ीमाबादी

इसी लिए तो हार का हुआ नहीं मलाल तक

अहमद अज़ीम

ऐ शाम-ए-हिज्र-ए-यार मिरी तू गवाही दे

अहमद अज़ीम

इसी लिए तो हार का हुआ नहीं मलाल तक

अहमद अज़ीम

फ़ित्ना उठा तो रज़्म-गह-ए-ख़ाक से उठा

अहमद अज़ीम

दस्तक हवा की सुन के कभी डर नहीं गया

अहमद अज़ीम

ऐसा इलाज-ए-हब्स-ए-दिल-ए-ज़ार चाहिए

अहमद अज़ीम

अब सोचिए तो दाम-ए-तमन्ना में आ गए

अहमद अज़ीम

उस लम्हे के लिए मुझे फ़ुर्सत नहीं

अहमद आज़ाद

हमें न देखिए हम ग़म के मारे जैसे हैं

अहमद अता

जितनी हम चाहते थे उतनी मोहब्बत नहीं दी

अहमद अशफ़ाक़

वफ़ा कम है नज़र आती बहुत है

अहमद अल्वी

अब मैं हूँ और ख़्वाब-ए-परेशाँ है मेरे साथ

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

कर के असीर-ए-ग़म्ज़ा-ओ-नाज़-ओ-अदा मुझे

अहमद अली बर्क़ी आज़मी

कलेजे में हज़ारों दाग़ दिल में हसरतें लाखों

आग़ा शाएर क़ज़लबाश

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