साथ Poetry (page 88)

आता ही नहीं होने का यक़ीं क्या बात करूँ

अहमद रिज़वान

क्या क्या मोहब्बतों के ज़माने बदल गए

अहमद रियाज़

क्या क्या मोहब्बतों के ज़माने बदल गए

अहमद रियाज़

ग़म-गुसारी

अहमद राही

वो बे-नियाज़ मुझे उलझनों में डाल गया

अहमद राही

कोई माज़ी के झरोकों से सदा देता है

अहमद राही

उम्र भर संग-ज़नी करते रहे अहल-ए-वतन

अहमद नदीम क़ासमी

आख़िर दुआ करें भी तो किस मुद्दआ के साथ

अहमद नदीम क़ासमी

तू बिगड़ता भी है ख़ास अपने ही अंदाज़ के साथ

अहमद नदीम क़ासमी

साँस लेना भी सज़ा लगता है

अहमद नदीम क़ासमी

जाने कहाँ थे और चले थे कहाँ से हम

अहमद नदीम क़ासमी

अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की

अहमद नदीम क़ासमी

तुम आए हो तुम्हें भी आज़मा कर देख लेता हूँ

अहमद मुश्ताक़

हम अपनी धूप में बैठे हैं 'मुश्ताक़'

अहमद मुश्ताक़

तुम आए हो तुम्हें भी आज़मा कर देख लेता हूँ

अहमद मुश्ताक़

पता अब तक नहीं बदला हमारा

अहमद मुश्ताक़

ख़ैर औरों ने भी चाहा तो है तुझ सा होना

अहमद मुश्ताक़

इश्क़ में कौन बता सकता है

अहमद मुश्ताक़

इक फूल मेरे पास था इक शम्अ' मेरे साथ थी

अहमद मुश्ताक़

हम से पहले तो कहीं प्यार न था शहर-ब-शहर

अहमद मासूम

उस से मिलना और बिछड़ना देर तक फिर सोचना

अहमद महफ़ूज़

फेंकते संग-ए-सदा दरिया-ए-वीरानी में हम

अहमद महफ़ूज़

किसी का अक्स-ए-बदन था न वो शरारा था

अहमद महफ़ूज़

ये तअल्लुक़ तिरी पहचान बना सकता था

अहमद ख़याल

उन को में कर्बला के महीने में लाऊँगा

अहमद ख़याल

जो तिरे ग़म की गिरानी से निकल सकता है

अहमद ख़याल

फ़ना के दश्त में कब का उतर गया था मैं

अहमद ख़याल

दश्त में वादी-ए-शादाब को छू कर आया

अहमद ख़याल

बस्ती से चंद रोज़ किनारा करूँगा मैं

अहमद ख़याल

कोई मंसब कोई दस्तार नहीं चाहिए है

अहमद कामरान

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