साथ Poetry (page 92)

कुछ रब्त-ए-ख़ास अस्ल का ज़ाहिर के साथ है

आफ़ताब हुसैन

कब तक साथ निभाता आख़िर

आफ़ताब हुसैन

गुज़रते वक़्त की कोई निशानी साथ रखता हूँ

आफ़ताब हुसैन

दिल भी आप को भूल चुका है

आफ़ताब हुसैन

देखे कोई तअल्लुक़-ए-ख़ातिर के रंग भी

आफ़ताब हुसैन

बस एक बात की उस को ख़बर ज़रूरी है

आफ़ताब हुसैन

क्यूँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो

आदिल मंसूरी

जिस्म की मिट्टी न ले जाए बहा कर साथ में

आदिल मंसूरी

तिलिस्मी ग़ार का दरवाज़ा

आदिल मंसूरी

सियाह सायों की तिश्नगी में

आदिल मंसूरी

सियाह चाँद के टुकड़ों को मैं चबा जाऊँ

आदिल मंसूरी

नज़्म

आदिल मंसूरी

नज़्म

आदिल मंसूरी

हश्र की सुब्ह दरख़्शाँ हो मक़ाम-ए-महमूद

आदिल मंसूरी

सोए हुए पलंग के साए जगा गया

आदिल मंसूरी

मुझे पसंद नहीं ऐसे कारोबार में हूँ

आदिल मंसूरी

कौन था वो ख़्वाब के मल्बूस में लिपटा हुआ

आदिल मंसूरी

हज का सफ़र है इस में कोई साथ भी तो हो

आदिल मंसूरी

दूर उफ़ुक़ के पार से आवाज़ के पर्वरदिगार

आदिल मंसूरी

चारों तरफ़ से मौत ने घेरा है ज़ीस्त को

आदिल मंसूरी

जो मह ओ साल गुज़ारे हैं बिछड़ कर हम ने

अदीम हाशमी

रख़्त-ए-सफ़र यूँही तो न बेकार ले चलो

अदीम हाशमी

लोगों के दर्द अपनी पशेमानियाँ मिलीं

अदीम हाशमी

हम बहर-ए-हाल दिल ओ जाँ से तुम्हारे होते

अदीम हाशमी

इक खिलौना टूट जाएगा नया मिल जाएगा

अदीम हाशमी

बस कोई ऐसी कमी सारे सफ़र में रह गई

अदीम हाशमी

आँखों में आँसुओं को उभरने नहीं दिया

अदीम हाशमी

ये ज़मीनी भी है ज़मानी भी

अदील ज़ैदी

सहरा-ओ-दश्त-ओ-सर्व-ओ-समन का शरीक था

अदील ज़ैदी

ख़ाली दुनिया में गुज़र क्या करते

अदील ज़ैदी

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