शाखा Poetry (page 17)

शमशीर-ए-बरहना माँग ग़ज़ब बालों की महक फिर वैसी ही

ज़फ़र

आसमाँ पर काले बादल छा गए

बद्र-ए-आलम ख़लिश

फलदार दरख़्तों ने रिझाया तो मुझे भी

बद्र वास्ती

कैफ़ियत-ए-दिल-ए-हज़ीं हम से नहीं बयाँ हुई

बीएस जैन जौहर

हवा के लब पे नए इंतिसाब से कुछ हैं

अज़रा वहीद

ग़ुबार-ए-जाँ पस-ए-दीवार-ओ-दर समेटा है

अज़रा वहीद

हार-सिंगार

अज़रा नक़वी

न हाथ सूख के झड़ते हैं जिस्म से अपने

अज़लान शाह

कमाँ न तीर न तलवार अपनी होती है

अज़लान शाह

इतने नज़दीक से आईने को देखा न करो

अज़ीज़ वारसी

ख़ल्वत हुई है अंजुमन-आरा कभी कभी

अज़ीज़ तमन्नाई

करते रहे तआ'क़ुब-ए-अय्याम उम्र-भर

अज़ीज़ तमन्नाई

कावाक

अज़ीज़ क़ैसी

दश्त-ओ-सहरा में समुंदर में सफ़र है मेरा

अज़ीज़ नबील

इतना भी बार-ए-ख़ातिर-ए-गुलशन न हो कोई

अज़ीज़ लखनवी

वही दाग़-ए-लाला की बात है कि ब-नाम-ए-हुस्न उधर गई

अज़ीज़ हामिद मदनी

सलीब ओ दार के क़िस्से रक़म होते ही रहते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

हज़ार वक़्त के परतव-नज़र में होते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

मैं शाख़-ए-सब्ज़ हूँ मुझ को उतार काग़ज़ पर

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

वो माहताब अभी बाम पर नहीं आया

अज़हर इक़बाल

बर्ग-ए-गुल शाख़-ए-हिज्र का कर दे

अय्यूब ख़ावर

आइने से गुज़रने वाला था

औरंगज़ेब

मैं छुपा रहूँगा निगाह-ओ-ज़ख़्म की ओट में

अतीक़ुल्लाह

धुएँ में डूबे हैं फूल तारे चराग़ जुगनू चिनार कैसे

अतहर सलीमी

वो दौर क़रीब आ रहा है

अतहर नफ़ीस

रौनक़-ए-बेश-ओ-कम किस के होने से है

अतहर नफ़ीस

सिसकते फूलों का कोई भी दर्द-मंद नहीं

अतहर अज़ीज़

फ़ाख़्ता शाख़ से उड़ते हुए घबराई थी

अताउल हसन

यक लम्हा सही उम्र का अरमान ही रह जाए

अता शाद

ख़ौफ़

असलम इमादी

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