वफ़ा Poetry (page 25)

क्यूँ तू ने वा किया था बंद-ए-क़बा चमन में

सग़ीर अली मुरव्वत

मैं ने जिन के लिए राहों में बिछाया था लहू

साग़र सिद्दीक़ी

मेरे तसव्वुरात हैं तहरीरें इश्क़ की

साग़र सिद्दीक़ी

इस दर्जा इश्क़ मौजिब-ए-रुस्वाई बन गया

साग़र सिद्दीक़ी

है दुआ याद मगर हर्फ़-ए-दुआ याद नहीं

साग़र सिद्दीक़ी

एक वा'दा है किसी का जो वफ़ा होता नहीं

साग़र सिद्दीक़ी

बात फूलों की सुना करते थे

साग़र सिद्दीक़ी

न कश्ती है न फ़िक्र-ए-ना-ख़ुदा है

साग़र निज़ामी

हैरत से तक रहा है जहान-ए-वफ़ा मुझे

साग़र निज़ामी

कुछ तो वफ़ा का रंग हो दस्त-ए-जफ़ा के साथ

साग़र मेहदी

उठ चले वो तो इस में हैरत क्या

साग़र ख़य्यामी

सारी जफ़ाएँ सारे करम याद आ गए

साग़र ख़य्यामी

दश्त गुलज़ार हुआ जाता है

सफ़िया शमीम

शम-ए-उम्मीद जला बैठे थे

सफ़िया शमीम

तालिब-ए-दीद पे आँच आए ये मंज़ूर नहीं

सफ़ी लखनवी

अपने अहद-ए-वफ़ा से रु-गर्दानी करता रहता है

सफ़दर सलीम सियाल

ग़म रात-दिन रहे तो ख़ुशी भी कभी रही

सईद अख़्तर

शिकस्त-ए-आबला-ए-दिल में नग़्मगी है बहुत

सादिक़ नसीम

रश्क-ए-महताब जहाँ-ताब था हर क़र्या-ए-जाँ

सादिक़ नसीम

अपनी आँखों से तो दरिया भी सराब-आसा मिले

सादिक़ नसीम

ज़िंदगी ग़म के अंधेरों में सँवरने से रही

सादिक़ इंदौरी

शिकवे की चुभन मुझ को सदा अच्छी लगी है

सदफ़ जाफ़री

यूँ लगे दर्द की इस दिल से शनासाई है

सचिन शालिनी

वो क्यूँ न रूठता मैं ने भी तो ख़ता की थी

साबिर ज़फ़र

शिकायत उस से नहीं अपने-आप से है मुझे

साबिर ज़फ़र

नज़र से दूर हैं दिल से जुदा न हम हैं न तुम

साबिर ज़फ़र

बेवफ़ा लोगों में रहना तिरी क़िस्मत ही सही

साबिर ज़फ़र

वो क्यूँ न रूठता मैं ने भी तो ख़ता की थी

साबिर ज़फ़र

शाम से पहले तिरी शाम न होने दूँगा

साबिर ज़फ़र

नज़र से दूर हैं दिल से जुदा न हम हैं न तुम

साबिर ज़फ़र

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